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दुर्गाष्टमी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

दुर्गाष्टमी एवं व्रत महात्म्य

ऋतु चक्र के अनुसार प्रत्येक व्रत का अपना विशेष पुण्य और विधान होता। इसी प्रकार श्री दुर्गाष्टमी व्रत अपने आप में काफी विख्यात एवं पुण्य फलों को देने वाली होती है। प्रत्येक महीने तिथियों का क्रम आता रहता है। जिसमें अष्टमी तिथि महीने में दो बार आती है। इस तिथि से संबंध रखने वाले देवी देवताओं की कृपा पाने के लिये तथा वांछित फलों की प्राप्ति व दुःख दारिद्र से छुटकारा पाने के लिये इस व्रत का विधान किया जाता है। इसमें श्री दुर्गाष्टमी अधिक प्रभावशाली शुभ एवं वांछित फलों को देने वाली होती है। जो चैत्र एवं शरद की नवरात्रों में सम्पूर्ण भारत में पूजी जाती है। जिससे साधकों को आदि शक्ति जगदम्बा की परम कृपा प्राप्त होती रहती है। मां दुर्गा का इस तिथि से संबंध होने से इसका नाम दुर्गाष्टमी पड़ा। माँ दुर्गा से संबंधित व्रत एवं प्रभावशाली कथानक हमारे धर्म ग्रन्थों में भरे पड़े हैं। जिसमें आसुरी शक्ति के द्वारा पीड़ित हुये देवता सहित सम्पूर्ण मानवता त्राहिमान कर रही थी। तथा ऐसे प्रतापी राक्षसों से छुटकारा दिलाने के लिये दुर्गाष्टमी का व्रत बड़ा ही महत्वपूर्ण है। जिसके प्रभाव से व्यक्ति धन, धान्य, पत्नी, पुत्र, पौत्र व स्वास्थ्य आदि लाभों को प्राप्त कर लेता है। चाहे वह व्यक्तिगत जीवन हो या फिर सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन हो दोनों ही पहलुओं में माँ की कृपा उसे प्राप्त होती हैं। क्योंकि माँ प्राकृति शक्तियों की संचालन कर्ता है तथा दुर्गा की कृपा से विविध प्राकृतिक उपद्रव शांत होते है। नवरात्रि में आठवें दिन माँ महागौरी के रूप को पूजा जाता है।

पूजा विधि इस व्रत में पवित्रता, संयम तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। तथा श्री दुर्गा देवी की पूजा में विहित पूजन समाग्री को एकत्रित करके विधि विधान से उनका पूजन करना चाहिये। क्योंकि आदि शक्ति जगदम्बा की पूजा अर्चना विशेष फल देने वाली है। भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में दुर्गाष्टमी पूजन के बारे में भगवान श्रीकृष्ण से धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा था। जिसमें श्री दुर्गाष्टमी पूजन का स्पष्ट उल्लेख है। जिससे यह पता चलता है। कि यह पूजन युग युगान्तरों से चला आ रहा है। माँ भगवती सम्पूर्ण जगत् में आदि शक्ति के नाम से सुविख्यात हैं जो विविध रूप एवं नामों में जानी एवं पूजी जाती है। शास्त्रों के अनुसार सम्पूर्ण जगत की रक्षक होने के कारण उन्हें सभी मानव एवं देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, अष्टमी तिथि में उनकी कृपा प्राप्त करने के लिये पूजते हैं। जिससे कष्ट एवं दुःख समाप्त जाते हैं तथा शत्रुओं से रक्षा होती है। इस प्रकार अष्टमी तिथि को व्रत रखते हुये दुर्गा देवी की विधि विधान से पूजा करनी चाहिये।

दुर्गाष्टमी की कथा

दुर्गाष्टमी के संदर्भ में अनेकों कथायें हमारे धर्म ग्रंथो में प्राप्त होती है। जिसमें कुछ संक्षेप में इस प्रकार है। प्राचीनकाल में जब असुर वरदानों की शक्ति को पाकर देव आदि लोकों को जीत कर अहंकार एवं अत्याचार को फैलाने में तुले हुये थे। तो उस असुर समूह का प्रमुख महिषासुर था। जिसके संहार हेतु देवी तथा देवताओं ने अपने दिव्य तेज से दुर्गा को प्रकट किया जो उस असुर समूह के पूरी सेनाओं का विनाश करते हुये मी तिथि में सबसे प्रमुख महिषासुर का वध कर दिया तथा जिससे देव सहित सम्पूर्ण मानव समुदाय प्रसन्न हुआ और अष्टमी तिथि को आदि शक्ति दुर्गा की पूजा अर्चना करने लगा। तब से आज तब अष्टमी तिथि का व्रत एवं पूजन अनवरत रूप से चल रहा है।

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