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गंगा दशहरा

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

गंगा दशहरा एक परिचय

गंगा दशहरा हिन्दू धर्म के बेहद पवित्र एवं मंगलकारी पर्व में से एक है। जो हमारे पवित्र आस्थाओं की देवी माँ गंगा के उपलक्ष्य में पूरे हर्षोल्लास के साथ ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। गंगा से जुड़ने और दशमी तिथि को मनाने के कारण इसका नाम गंगा दशहरा पड़ा। यह पर्व विशेष रूप से हरिद्वार, वाराणसी, प्रयाग आदि गंगा तटों में मनाया जाता है। यह जगत में जीवन का संचार कर रही है। माँ गंगा के जन्मोत्सव के रूप मे मनाया जाता है। क्योंकि त्रिपथ गामनी माँ गंगा को इसी पर्व में भागीरथी ने अपने घोर तप बल के द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करके प्रकट किया था। जिससे उनके साठ हजार पुर्खो को तारने का लक्ष्य पूरा हुआ था। तथा संसार के कल्याण का लक्ष्य माँ गंगा आज भी साधने में लगी हुई है। देव लोक से यहाँ मृत्यु लोक में देवता के द्वारा इसे लाने के कारण ही इसे देव नदी के रूप में भी जाना जाता है।

गंगा दशहरा में स्नान का महत्व

इस पर्व पर गंगा के अमृतमय जलाशयों में स्नान दान एवं तप, जप, पूजा आर्चना का बड़ा ही महत्व होता है। इस अवसर पर जो भी गंगादि तीर्थों में श्रद्धा भक्ति के साथ स्नान एवं दानादि दिये जाते हैं। वह बहुत पुण्यफल देने वाले होते हैं। जल ही जीवन है। किन्तु गंगा जल जीवन के लिये अमृत है। इस पीयूष को पान करने से अनेकों रोग व चर्म पीड़ायें आदि दूर होती हैं। अतः गंगा के तीर्थ जल में इस पर्व में स्नान करने से कम से कम दश पापों का विनाश हो जाता है। जो भी मानव द्वारा जाने अनजाने में पाप होते हैं। उन सभी से उद्धार करने की शक्ति मां गंगा में विद्यमान है। क्योंकि कायिक यानी शरीर के द्वारा होने वाले पाप वाचिक किसी को अप्रिय कहने तथा वचनों के द्वारा दुःख व पीड़ा पहुंचाने से उत्पन्न पाप और मानसिक अर्थात् मन से किसी के प्रति अप्रिय वचन कहने आदि से उत्पन्न पाप जो सामान्य तौर पर पाप की श्रेणियां हैं। वह गंगा में स्नान एवं दान तथा पूजा आदि कर्म के विधि पूर्वक करने से समाप्त हो जाते हैं। क्योंकि इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसी दास अपने श्रीराम चरित्र मानस में लिखते हैं: दरश परश मुख मंजन पाना। हरै पाप कह वेद पुराना।। अर्थात् गंगा के दर्शन और स्नान तथा गंगा जल को पीने से पाप समूहों का विनाश हो जाता है। इस बात को हमारे वेद और पुराण स्थान-स्थान में कहते हैं। जो इस संबंध में सबसे सटीक उदाहरण भी है।

गंगा दशहरा में दान देना क्यों खास

गंगा दशहरा के पर्व में जहाँ गंगा स्नान एवं गंगा जल के पान का महत्व है। वहीं ज्येष्ठ माह की शुक्ल दशमी तिथि एवं हस्त नक्षत्र में पृथ्वी पर माँ गंगा के अवतरण का अच्छा खासा महत्व है। इस देव नदी गंगा के इस पर्व पर धार्मिक कृत्य एवं पूजा कर्म जहाँ कई गुना फलदायक माने जाते हैं। वहीं अन्न दान, वस्त्र दान, फल का दान और विविध प्रकार के व्यंजनों, चने से बने सतुये, मिठाईयों एवं रूपयों आदि का दान साधु, संतों एवं मठाधीशों और विद्वान ब्राह्मणों को देने और गरीबों को दान देने का बहुत ही महत्व है।

गंगा दशहरा पूजा एवं व्रत

इस पर्व में माँ गंगा की पूजा अर्चना विविध प्रकार के उपचारों से की जाती है। जिससे सभी पूजन की सामाग्री को एकत्रित करके मांगलिक श्लोकों को पढ़ते हुये गणेशादि देवताओं का ध्यान करते पुनः माँ गंगा का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प लें। ध्यान रहें यह संकल्प आदि क्रिया शौचादि शुद्धि क्रियाओं के उपरान्त करने का विधान होता है। व्रत के संकल्प के बाद सकाम पूजन का संकल्प लें। और माँ गंगा का ध्यान करते हुये उन्हें स्नान करायें, इसके बाद वस्त्र, पुष्प, चंदन, चावल, आदि अर्पित करे तथा धूपादि दीप करने के पश्चात् जो भी आपके पास फल मिष्ठान हो उसे माता को अर्पित करें। तथा विधि पूर्वक पूजन करने के पश्चात् गंगा के स्त्रोत एवं मंत्रों को उच्चारित करें। या फिर उन्हें दश या अधिक बार जपें। गंगा सभी पापों व तापों को मिटाने वाली होती है। यदि आप स्त्रोत को संस्कृत में नहीं पढ़ सकते हैं तो फिर हिन्दी में ही इस प्रकार माँ गंगा का ध्यान करते हुये उनसे विनय करें। माँ गंगा को मेरा नमस्कार है सादर प्रणाम है। जो श्वेत मगरमच्छ के ऊपर विराजमान है। तथा त्रिनेत्रों से युक्त और चतुर्भुजी माता कलश एवं कमल दल से शोभित तथा अभय मुद्रा से युक्त भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली हैं। उन्हें मेरा बारम्बार प्रणाम हैं। जो त्रिदेव रूपी है। माँ जान्ह्वी को बारम्बार प्रणाम है। जो भगवान ब्रह्म जी कमल से भगवान शिव की जटा और फिर भगवान के चरणों को पखारते हुये इस धरा पर अविरल पवित्र धारा से प्रवाहित हैं, उन्हें बारम्बार मेरा प्रमाण है। या फिर ऊॅ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः का यथा शक्ति जप करें। तथा गंगा जल में विचरण करने वाले कच्छ एवं मच्छ आदि जो भी जीव हैं उनके निमित्त कुछ गुड़ अनाज आटें की गोली डालें और मत्स्य रूप में मछली तथा कच्छपावतार के रूप में भगवान कच्छप की भी पूजा करने विधान होता है। इस पर्व के दशमी तिथि में होने के कारण दश संख्या का महत्व बढ़ जाता है। जिससे 10 किलो गेंहू, 10 किलों जौ और 10 किलों तिल आदि को ब्रह्मणों को देने का विधान भी है।

गंगा दशहरा की कथा

एक समय की बात है महाराजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की शुरूआत की जिसकी सुरक्षा उनके पौत्र अंशुमान कर रहे थे। किन्तु देवयोग से उनके अश्व को किसी ने अपहरण कर लिया। जिसके बिना यज्ञ कार्य सम्भव नहीं था। जब यह जानकारी अंशुमान को हुई तो वह किसी भी चुनौती से निपटने के लिये वह 60 हजार सेना और परिवार के सदस्यों के साथ सम्पूर्ण धरती में उस घोड़े को ढूढ़ा। किन्तु कहीं कोई पता नहीं चला। जिससे उसे पाताल लोक में ढूढ़ने के लिये जा पहुंचे उन्होंने देखा कि जहाँ भगवान कपिल मुनि तपस्या कर रहें हैं, वहीं उनका घोड़ा चर रहा है। जिससे उनके साथ गये हुये लोग बड़ी जोर से चोर्! यही है वह चोर! कहने लगे। जिससे महिर्षि की तपस्या भंग हो गयी और वह अपने तेजस्वी नेत्रों से अपने पास आये हुये लोगों को देखा जिससे सभी वहीं भस्म हो गये। इनके उद्धार के लिये महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ ने अपने पूर्वजों को तारने के लिये गंगा को धरती पर लाने के लिये कई वर्षों तक कठोर तप किया। जिस तप से प्रसन्न होकर भगवान परम पिता ब्रह्म जी ने गंगा को धरती पर अवतरित होने का वरदान दिया था। किन्तु गंगा की अति तेज धारा के वेग को धरती सहन नहीं कर पा रही थी। जिससे भागीरथी ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिव ने उस गंगा के वेग को अपने जटाओं में समाहित कर लिया और महिर्षि भागीरथी के विनय पर एक छोटी सी जटा को धरती की तरफ खोल दिया। जिससे गंगा का कुछ अंश धरती पर आज जिसे हम देख रहे हैं कल-कल करके प्रवाहित होने लगा। और भागीरथी ने अपने पूर्वजों की अस्थि को गंगा में विसर्जित कर दिया। जिससे उनके पूर्वजों को मोक्ष एवं सद्गती मिल पाई। और दृढ़प्रतिज्ञ भागीरथ अपने प्रयासों से पूर्वजों को तारने तथा लोक कल्याणी गंगा को धरती पर लाने के लिये सैदव अमर बने हुये हैं। और आज भी उन्हें याद किया जाता है।

गंगा दशहरा एवं मान्यतायें

गंगा दशहरा के अवसर पर दान पुण्य करने से दश महापातकों से मुक्ति मिलती ऐसा स्कन्द पुराण का वचन है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति किसी कारण से गंगा यानी हरिद्वार आदि नहीं जा सकते हैं, वह किसी शुद्ध जलाशय में स्नान करके तीर्थ एवं देवी देवताओं के निमित्त अर्घ्य दें। और विधि पूर्वक तर्पण करें। इससे दश महापापों का नाश हो जाता है। इसी प्रकार भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है। यानी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन गंगा के जल में श्रद्धा विश्वास के साथ स्नान करके और फिर गंगा जल का आचमन करके एवं विधि पूर्वक गंगा के स्त्रोत को पढ़ता है। उसके दशमहा पातकों का नाश हो जाता है। चाहे वह गरीब हो या लाचार उसे भी भक्ति पूर्वक गंगा के स्त्रोत को जपने से वांछित फल प्राप्त होता है। तथा उसके दश पापों का विनाश हो जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार गंगा दशहरा के अवसर पर जो व्यक्ति गंगा के स्त्रोत का भक्ति पूर्वक पाठ करता उसके भव वंधन छूट जाते हैं। तथा दारिद्रता आदि दूर होती है। यदि रोगी व्यक्ति माँ गंगा के पाठ यानी स्त्रोत का जाप करता और स्त्रोत्र का पाठ करता हैं। तो उसके सभी पातक छूट जाते है। यानी रोगी रोग मुक्त हो जाता है। और वंदी वंधन से छूट जाता है। इस स्त्रोत के लिये आपको किसी धार्मिक पुस्तकालय से गंगा स्त्रोत या फिर गंगा दशहरा स्त्रोत वाली पुस्तक को साथ लेकर जाना चाहिये। क्योंकि गंगा के स्त्रोत को भक्ति  पूर्वक पढ़ने से स्थावर और जंगम के जो विष है वह दूर होते हैं। इस दिन गंगा तट पर मुण्डन संस्कार की मान्यतायें भी है।

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