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रंगों का त्यौहार होली वर्ष 2018

Date : March 3, 2017  | Author : Astrologer Umesh

होली का इतिहास – होली का त्यौहार वर्ष 2018

सत्य सनातन हिन्दू धर्म में युगों से सजीवता की लहर दौड़ रही है। जब भी धरा पर अनीत व बुराइयां लोगों को अक्रान्त करने लगती हैं, तभी धर्म की रक्षा हेतु परम ईश्वर किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं। भगवान नरसिंह का अवतार इसी ओर संकेत करता है। वैसे होली का इतिहास अति प्राचीन हैं। जो भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य देश, नेपाल आदि में भी मनाया जाता है। हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मों के लोग भी इस त्यौहार को मनाते हुए रंगों में रंगे हुए बड़ी आसानी से दिख जाते हैं। क्योंकि यह वसंत ऋत्रु का ऐसा वसंती त्यौहार है, जो हर किसी को अपनी ओर खींच ही लेता है। क्योंकि यह दुनियां रंग-विरंगी है। अर्थात् शायद ही ऐसा व्यक्ति होगा जिन्हें रंग नहीं लुभाते हो। देश काल परिस्थिति में वंधे हुए व्यक्ति को भले ही वक्त न आने दे रहा हो, किंतु रंगों की शक्ति व आकर्षण इतना तीव्र होता है कि धर्म व देश की सीमाएं उसे रोक पाने में इतिहास में और वर्तमान में भी सक्षम नहीं हो सकी हैं। इस तथ्य को हम इतिहास के पन्नों में देखे तो, पूर्व काल के राजाओं महाराजाओं सहित सामान्य जनों की होलियारी टोली, वंसती झूले, राग, रागिनियों, कबिताओं, लोक गीतों में होली के जलाने व रंगोली के खेलने का वर्णन बाखूब मिलता है। चाहे वह इतिहास के पन्ने हो या फिर पुराने शिलाभिलेख हो, प्राचीन मंदिर की दीवारें हो, वहाँ होली जलाने खेलने, रंग लगाने, फाग गाने के बड़े सजीव उदाहारण आज भी हमें प्राप्त होते हैं। भविष्यपुराण व नारद पुराण सहित अन्य संदर्भ ग्रंथों में भगवान के अवतरण व भक्त प्रह्लाद् की कथा उपलब्ध होती है।

बात करें साहित्य व संगीत में तो चाहे वह संस्कृत साहित्य हो या फिर हिन्दी साहित्य हो, वहाँ वसंत के वर्णन होली के रंग व पिचकारियों के साथ ही भगवान राधाकृष्ण के चरित्र में बरसाने, मथुरा की होली, उत्तर-प्रदेश का फाग, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, बिहार, असम, बंगाल, नेपाल सहित अनेक प्रसिद्ध स्थानों की होली का वर्णन कवि की कविताओं व लेखों में देखने को मिलता है। इसी प्रकार भक्ति काल के कवियों द्वारा भगवान श्री कृष्ण की लीला में गोप-गोपियों द्वारा परस्पर रंग डालने व उनके साथ भगवान की लीलाओं का बड़े मनोरम ढंग से वर्णन मिलता है।

होली की परंपराएं एव संबंधित कथाएं

होली भारत का अति प्राचीन व परम्परागत त्यौहार हैं। होली को मनाने व जलाने से पहले ही परम्परागत कुछ तैयारियां की जाती हैं। होली आने के कम से कम आठ दिन पहले तैयारियों पर सार्वजनिक रूप से अमल होने लगता है। क्योंकि शीत ऋतु के जाने व ग्रीष्म के प्रवेश का संकेत व फसलों के तैयार होने का समाज के लिए संदेश है, जिसके लिए सम्पूर्ण समाज सफलों को अपने-अपने घर लाने व उनके रख-रखाव हेतु कमर कस लेता है। इस हेतु परम्परागत रूप से होलाष्टक के दिन अर्थात् त्यौहार के आठ दिन पहले जहां पहले होली जलती रही हैं। वहाँ होली के संकेत में एक लकड़ी का डंडा या नया लाठा उसमें एक झंडा लगाकर विधि-विधान के साथ पूजन अर्चन करके संबंधित लोगों द्वारा गाड़ा जाता है। जिससे लोग उस स्थान में आस-पास उपलब्ध लकड़ियों के टुकड़ें घास, उपले आदि को बड़े उत्साह के साथ इक्कठे करते हैं। इससे इधर-उधर बिखरे हुए घास-फूंस व लकड़ियों को एकत्र कर आस-पास की शुद्धता होती हैं। होली जलने के आठ दिन पहले ही होलाष्टक शुरू हो जाते है। इस दौरान नए, कार्य, नववधू की यात्रा, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि कार्यों को नहीं करना चाहिए। सम्पूर्ण भारत में लोग यथा स्थान जो वहाँ के लिए जो विहित है। समय के अनुसार ईधन व लकड़ियों और उपलों को एकत्रित करके होली के दिन उसे एक निश्चित मुहुर्त में जलाते हैं। जिसे होलिका दहन कहा जाता है। इस दौरान खेतों में तैयार चने व जौ की बालें, व गाय के गोबर के छोटे-छोट गोलाकार बल्ले बनाकर पहले से ही लोग सुखाकर रख लेते हैं। उन्हें मूंज की बनी हुए रस्सी में पिरो लेते हैं और फिर दूध, दही, गंगा जल, चावल, हल्दी, सिंदूर, सहित नैवेद्य आदि को लेकर जो मुहुर्त तय होता है, उसी में लोग होलिका दहन हेतु एकत्रित होकर होली की पूजा करते हैं और लोग उसकी परिक्रमा लगाते हैं व तापते हैं, तथा चने के होरे व जौ की बालियों को किसी बड़े लंबे डंडें में बांधकर लोग उसे अग्नि में भून लेते हैं। जिसे लोग हूमी होरा भी कहते हैं। होली में परिक्रमा विषम संख्या में करने का विधान होता है। इसी जलते हुए होली के दौरान विभिन्न तरह के लोक-गीतों का आयोजन संबंधित होलिहारों द्वारा गाएं जाने की परम्परा है।

शास्त्रों का कथन है। कि होलिका का दहन प्रदोष काल में सांयकाल के बाद भद्रा को छोड़कर किया जाता है। क्योंकि भद्रा में होलिका दहन करने से संबंधित देश व प्रदेश में कई तरह के प्रकृतिक उत्पात व बीमारियों के बढ़ने की स्थिाति बन जाती है। अतएव इस समय को छोड़ कर होलिका दहन करना चाहिए। अर्थात् शास्त्रीय ढंग से होलिका दहन करने व होली तापने जाने से बड़ा ही पुण्य फल प्राप्त होता है। होली के संदर्भं में पौराणिक ग्रंथों में कई स्थानों पर भक्त प्रहलाद उसकी भगिनी होलिका व पिता हिरण्यकशिपु की कहानियां हैं, जिसमें प्रमुख रूप से प्रह्लाद की भक्ति व श्रद्धा की विजय होती है। ईश्वर व सत्य से विमुख दुष्ट उकसे पिता के अन्दर राक्षसी प्रवृत्ति ने उसे देवत्व व परोपकार से विमुख कर रखा था। जिससे वह ईश्वर के प्रति अश्रद्धालु होकर खुद को ही ईश्वर मान बैठा था। अर्थात् प्रह्लाद के अतिरिक्त भगवान श्रीकृष्ण की कथाएं व लीलाएं है। जिसमें भगवान ने आज के ही दिन पूतना का वध किया था। जिससे सभी ग्वाल-वाल प्रसन्न होकर एक दूसरे पर रंग डालते हैं। अर्थात् होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। जिससे लोग रात को ढ़ोल नगाड़ों की धुन में नाचते व होली के गीत गाते दिखाते देते है।

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होली एवं संगीत

होली के त्यौहार पर स्थानीय व लोक गीतों सहित फिल्मी गीतों की गूंज सुनाई देती है। चाहे वह टेलीवीजन हो या फिर रेड़ियो, या फिर दिल्ली व पंजाब का भागड़ा या फिर उत्तर-प्रदेश के फाग हो, इस त्यौहार के मौसम पर विविध स्थानों प्रदेशों व देशों में लोक गीत व प्रचलित संगीत आदि को गाएं जाने व आनन्द मनाएं जाने का जुनून दिखाई देता हैं। क्योंकि होली जहां पारिवारिक एकता व सामाजिक सहयोग का संदेश हमारे मध्य लाती हैं, वहीं वसंती रंगों में लोगों को जीवन को सकारात्मक बनाने व नकारात्मक सोच को दूर कर सृजनात्मक कार्यो को अंजाम देने के लिए प्रेरित करती है।

होली या रंगोत्सव

होली जलने के ठीक दूसरे दिन रंगोली का त्यौहार आता है। जिसे धुरेहड़ी भी कहा जाता है। यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा के बाद ठीक प्रतिपदा तिथि में मनाएं जाने का विधान होता है। जो वसंत बहारों के द्वारा खिलाएं गए फूल व फल तथा वनस्पतियों से सम्पन्न धरा के सौंदर्य को दूना करती है। जब मानव जीवन रंग-गुलालों को एक दूसरे के ऊपर उछालते या लगाते हैं। इस दौरान सगे संबंधियों सहित गांव समाज के मित्र तथा पहचान के लोग पास-पड़ोस के लोग आपस में एक-दूसरे को रंग व गुलाल लगाते हैं। आपस मे प्रेम-भाव से गले मिलते हैं। पूर्व के यदि बैर-भाव हैं, तो उन्हें भुलाकर वह एक दूसरे के घर जाकर आपस में गले मिलते है। रंग लगाते हैं। विविध प्रकार के पकवान, गुजियों का स्वाद तथा मेवे व खोवे से बनी हुई मिठाइयां का आदान प्रदान करते है। यह ऐसा रोचक व सकारात्मक वातावरण होता है कि लोग बड़े, बूढ़ों को जीवन के सकारात्मक रंगों से रंगने हेतु उत्साहित कर देते है। यद्यपि हुडदंग व फूहड़पन कई युवा व युवतियों के लिए हानि प्रद रहता है। अतएव इससे बचते हुए सद्भावना पूर्ण रंगोली खेलनी चाहिएं। यथोचित रंग व अबीर-गुलाल लगाकर नमस्कार व प्रणाम करना या फिर गले मिलना चाहिए। विविध प्रकार की रंगों की सजीवता हमें अपनी ओर खीचती तो है, ही साथ ही हमारे तन, मन को सकारात्मक बनाने में भी सहयोग करती है। भारत वर्ष में यद्यपि होली का त्यौहार समूचे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाएं जाने का रिवाज है। शहरी क्षेत्रों में लोग प्रातः से दोपहर के समय को अधिक उपयुक्त मानते हुए रंग खेलने व एक दूसरे को लगाने में अधिक सक्रिय रहते हैं। इसके बाद स्नानादि करके नए कपड़े पहन कर मित्रों व रिश्तेदारो के यहां जाने में व्यस्त रहते हैं। कहने का अभिप्राय रंगोली कहीं पूरे दिन, कही दो, तीन दिन तक और कहीं कहीं इसे 15 दिन तक मनाएं जाने का विधान हैं। अर्थात् लोग भिन्न-भिन्न तरीकों से इसे मनाते है। जिसमें व्रज की होली और बरसाने की लठमार होली में पुरूषों द्वारा महिलाओं को रंग डाला जाता है। और महिलाओं द्वारा पुरूषों को कपड़े के बनें कोड़ो व लाठी डंडों से पीटा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान मथुरा-वृंदावन में रंगोली का पर्व बड़ा ही अद्वितीय होता है। दिल्ली, हरिणाया, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात आदि सभी प्रदेशों सहित नेपाल में भी इसकी धूम रहती है। ढ़ोल की थाप पर नाचते व फाग गाते लोग, फगुहारों की टोली, भाँग व ठंड़ई, तथा कई पकवानों को लोग एक दूसरे को बाँट कर आनन्द लेते हैं।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

होलिका दहन के संदर्भ में पुराणों में बड़ा ही रोचक कथानक है। जिसमें भक्त प्रह्लाद भगवान के प्रति समर्पित भाव से भक्ति में व आराधना में लीन था। किन्तु दुर्भाग्य वश उसके पिता हिराकश्यप उसकी इस भक्ति से उसे रोकते है। क्योंकि वह श्री हरिविष्णु जी से बैर-भाव रखता था तथा अपने शक्ति व वैभव के बल पर अपने को ही भगवान मानने की सतत् गलती दोहराता रहा, हिराकश्यप राक्षसी प्रवृत्ति का था, वह देवता से भी विरोधी करता था। अर्थात् देव, गुरू, ब्राह्मण, यज्ञादि सभी के खिलाफ था। किन्तु दैव योग से उसके यहाँ एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जिसका नाम प्रह्लाद था, हुआ जो भगवान की भक्ति में बचपन से ही संलग्न था। एक दिन की बात है वह अपने आराध्य श्रीहरि विष्णु की आराधना कर रहा था तभी उसके पिता को यह बात ज्ञात हुई और उसने उसे भूलकर भी ऐसा न करने का निर्देश दिया। किन्तु कहते हैं भक्त के लिए भगवान ही सब कुछ होते हैं और वह नहीं माना और श्री हरि का स्मरण करता रहा, उसके इस कृत्य की सजा देने के लिए उसके पिता ने उसे भांति-भांति के कष्ट दिए, अपने सैनिकों को आज्ञा देकर उसे मतवाले पागल हाथी के सामने डलवा दिया। किन्तु श्री हरिकृपा से वह हांथी उसे मारने के बजाए अपने ऊपर बिठा लिया और वह खेलता रहा उसका कुछ भी नहीं बिगड़ा। उस छोटे से भक्त को वह अनेक कष्ट व पीड़ाएं देता रहा है। इसी प्रकार एक दिन उसने उसे आग में जलाने के उद्देश्य से उसकी बहन होलिका को कहा कि वह उसको आग में लेकर बैठ जाए। जिससे वह प्रह्लाद जलकर नष्ट हो जाए क्योंकि उसकी बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था, कि वह आग में जल नहीं सकती। किन्तु हरि इच्छा से उल्टा हुआ जब राक्षसी समूह का अगुवा हिरण्यकश्यप उसे बहन के साथ बैठाकर आग लगा दी तो, वह प्रह्लाद सुरक्षित खेलता हुआ उससे निकल आया, किन्तु उसकी कपटी बहन जलकर खाख हो गई। तब से आज तक इस त्यौहार को होली व धुरेही अर्थात् रंगोली अच्छाई की जीत व बुराई की हार के रूप में स्वीकार किया गया।

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वर्ष 2018 में होली  मुहुर्त

इस वर्ष होली का त्यौहार, फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा(उदय व्यापिनी तिथि में) 01.03.2018 को दिन गुरूवार को होलिका दहन व पूजन प्रदोष काल में होगा।  श्रद्धालुओं को पूजन मे विहित वस्तुओं को लेकर होली का पूजन करना चाहिए। इसके दूसरे दिन चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को रंगोली का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में मनाया जाएगा।

  • 01 मार्च 2018 (गुरूवार) को होलिका दहन मुहूर्त:  18:20:47 से 20:49:49 तक
    अवधि: 2 घंटे 29 मिनट
  • 02 मार्च 2018 (शुक्रवार) को सभी लोग रंगों के इस त्यौहार का आनंद उठाएंगे।

रंगों का त्यौहार होली की आप सभी को पवित्र ज्योतिष केंद्र की तरफ से हार्दिक शुभकामनाये ।  

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