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कलंक चतुर्थी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

कंलक चतुर्थी व्रत एवं महत्व

यह व्रत व्यक्ति के अनेक अनिष्टों को दूर करने वाला बहुत ही प्रभावशाली एवं पुण्यफल प्रदाता है। जिसके प्रभाव से वह जीवन में कई ऐसे कंलकों एवं घटनाओं से बच सकता है। जिसकी वजह से उसे परेशानी झेलनी पड़ती है। कंलक चौथ के संबंध में कहा जाता है। कि इस दिन चन्द्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिये। नही तो इससे देखने वाले व्यक्ति को कोई बड़ा कंलक या दोषारोपण का सामना करना पड़ता है। चाहे वह जिस प्रकार के दोष हो उससे उसका बच पाना मुश्किल हो जाता है। अतः इस दिन भगवान श्री गणेश की अर्चना करते हुये उनका पूजन विधि विधान से करते हुये व्रत का श्रद्धा पूर्वक पालन करना चाहिये। और चन्द्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिये। चतुर्थी तिथि में भगवान गणेश का व्रत एवं पूजन बड़ा ही फल देने वाला होता है। इसे चतुर्थी को आम बोल-चाल की भाषा में कंलक चौथ या चतुर्थी कहते है। कुछ स्थानों में यह पत्थर चौथ के नाम से भी जानी जाती है। चतुर्थी के विषय में कहा जाता है। कि श्री गणेश के शाप के कारण चन्द्रमा के दर्शन निषेध हो जाते है। अतः भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चौथ को चन्द्रमा के दर्शन नहीं करना चाहिये। इससे व्यक्ति को कोई बड़ा आक्षेप एवं पाप लग सकता है। हालांकि वर्ष पर्यन्त चन्द्रमा के दर्शन एवं पूजन का अत्यंत पुण्य फल प्राप्त होता है। किन्तु कंलक चौथ के दिन चन्द्रमा के दर्शन वर्जित होते हैं। जो लोग इस दिन अनजाने में भगवान चन्द्रमा के दर्शन करते हैं वह उसके दुष्प्रभाव को मिटाने के लिये कुछ रोड़े इधर-उधर फेंकते हैं। जिसके कारण इसका नाम पत्थर चौथ भी है। हालांकि यह प्रथा बहुत पहले व्याप्त थी अब लोग भगवान गणेश की पूजा अर्चना और भक्ति करके चन्द्रमा के दर्शन और अन्य दूसरे अरिष्टों को मिटाने में दिलचस्पी दिखाते हैं। जिससे गणेश चतुर्थी के व्रत और भी महत्व बढ़ जाता है।

कंलक चौथ पूजा एवं व्रत

कलंक चतुर्थी व्रत में भगवान की गणेश की पूजा का विधान होता है। अतः पवित्रता आदि का ध्यान देते हुये भगवान की श्री गणेश की पूजा में प्रयोग होने वाली सामाग्री को एकत्रित करके उनकी विधि विधान से पूजा करें। और उसे भगवान को समर्पित कर दें। तथा क्षमा प्रार्थना करें कि किसी भी भूल चूक को प्रभु क्षमा करें। हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें। तथा वांछित फल दें। आदि प्रार्थना करें।

कंलक चौथ व्रत एवं कथा

इस संदर्भ में पौराणिक कथा है कि प्राचीन समय की बात है। कि चन्द्रमा को अपनी सुन्दरता पर बढ़ा ही नाज था। वह गणेश के जी बड़े पेट एवं टेढ़ी सूड़ को देखकर हंसने लगे। जिससे श्री गणेश क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया कि तुम्हें क्षय रोग होगा। आज से इस तिथि में जो तुम्हारा दर्शन करेगा उसे कंलक लगेगा। जिससे चन्द्रमा भगवान के शरीर का पतन होने लगा और वह क्षीण होते चले गयें। इस रोग के कारण वह मृत्यु के करीब पहुंच रहे थे। तभी देवताओं न उन्हें भगवान शिव की आराधना के लिये कहा। जिससे चन्द्रमा की आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक में धारण कर लिया और उनके जीवन की रक्षा हो पाई। आदि इस प्रकार के कथान प्रचलित हैं।

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