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माँ चंद्रघण्टा – नवदुर्गा की तीसरी शक्ति

Published On : April 2, 2017  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) की उत्पत्ति

तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) की उत्पत्ति हिन्दूस्तान के धरातल पर युगों से परम शक्ति ईश्वर के दर्शन की लालसा का प्रतीक है। यहां समृद्ध परम्पराएं इस बात की गवाह हैं कि मानवता व धर्म की रक्षा हेतु ईश्वरीय शक्ति का किसी न किसी रूप में अवतार होता रहता है। धरती पर सुख-समृद्धि देव-देवी की कृपा के बिना संभव नहीं है। दुष्ट राक्षसी प्रवृत्तियां धर्म और मानवता को हानि पहुँचाने लगती हैं। इन्हें नष्ट करने हेतु माँ दुर्गा नव रूपों में प्रकट होती हैं, जिनमें तृतीय मूर्ति को चंद्रघण्टा कहा जाता है।

तृतीय माँ चंद्रघण्टा का स्वरूप और महत्व

तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) श्रद्धालु भक्तों के भय, पीड़ा और दुःखों को मिटाने वाली मानी जाती हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन इस रूप की पूजा होती है। यह रूप अनूठी वस्तुएं देने वाला तथा कई दिव्य ध्वनियों को नियंत्रित करने वाला है। उनकी कृपा से व्यक्ति की घ्राण शक्ति दिव्य हो जाती है और वह विभिन्न प्रकार की खुशबुओं का आनंद लेने में सक्षम हो जाता है। माँ दैत्यों का वध करके देव, दनुज और मनुष्यों के हितों की रक्षा करती हैं। जिनके घण्टा में आह्लादकारी चंद्रमा हो, उन्हें चंद्रघण्टा कहा जाता है। अर्थात् जिनके माथे पर अर्द्धचंद्र शोभित होता है।

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तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) की भुजाएँ और वाहन

तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Goddess Chandraghanta) का रूप सुवर्ण कांति से युक्त है और इन्हें दस भुजाओं वाली देवी कहा जाता है। दाहिने हाथ में पद्म, बाण, धनुष और माला शोभित हैं। बाएँ हाथ में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल तथा युद्ध की मुद्रा है। यह माता सिंह पर सवार होकर जगत के कल्याण हेतु दुष्ट दैत्यों का संहार करती हैं। माँ का यह स्वरूप शत्रुओं के विनाश के लिए सदैव तत्पर रहता है और भक्तों को साहस व सुरक्षा का आशीर्वाद प्रदान करता है।

माँ चंद्रघण्टा की पूजा का महत्व

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) श्री माँ दुर्गा का तृतीय रूप हैं, जिनकी पूजा आराधना नवरात्रि के तीसरे दिन करने का विधान होता है। अतः माँ चंद्रघण्टा की पूजा शास्त्रीय विधान को अपनाते हुए करनी चाहिए। शारीरिक शुद्धता के साथ ही मन की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए।

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) की पूजा विधि

इस दिन माता की पूजा विविध प्रकार के सुगन्धित पुष्पों तथा नैवेद्यों व इत्रों से करने का विधान होता है। इससे साधक को वांछित फलों की प्राप्ति होती है और शरीर में उत्पन्न पीड़ाओं का अंत होता है। पूजा व क्षमा प्रार्थना के बाद माँ को प्रणाम करते हुए पूजा और आराधना को माता को अर्पण कर देना चाहिए।

चंद्रघण्टा की कथा (Chandraghanta Ki Katha)

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) असुरों के विनाश हेतु माँ दुर्गा के तृतीय रूप में अवतरित होती हैं। जो भयंकर दैत्य सेनाओं का संहार करके देवताओं को उनका भाग दिलाती हैं। भक्तों को वांछित फल दिलाने वाली हैं। आप सम्पूर्ण जगत की पीड़ा का नाश करने वाली हैं। जिससे समस्त शास्त्रों का ज्ञान होता है, वह मेधा शक्ति आप ही हैं। दुर्गा भवसागर से उतारने वाली भी आप ही हैं। आपका मुख मंद मुस्कान से सुशोभित, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमा के प्रतिबिंब का अनुकरण करने वाला और उत्तम सुवर्ण की मनोहर कान्ति से कमनीय है।

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देवी चन्द्रघण्टा और महिषासुर का संहार

तो भी उसे देखकर महिषासुर को क्रोध हुआ और सहसा उसने उस पर प्रहार कर दिया। यह बड़ी आश्चर्य की बात है कि जब देवी का वही मुख क्रोध से युक्त होने पर उदयकाल के चन्द्रमा की भांति लाल और तनी हुई भौहों के कारण विकराल हो उठा, तब उसे देखकर महिषासुर के प्राण तुरंत निकल गए। यह उससे भी बढ़कर आश्चर्य की बात है, क्योंकि क्रोध में भरे हुए यमराज को देखकर भला कौन जीवित रह सकता है। देवी! आप प्रसन्न हों। परमात्मस्वरूपा आपके प्रसन्न होने पर जगत का अभ्युदय होता है और क्रोध में भर जाने पर आप तत्काल ही कितने कुलों का सर्वनाश कर डालती हैं। यह बात अभी अनुभव में आयी है, क्योंकि महिषासुर की यह विशाल सेना क्षण भर में आपके कोप से नष्ट हो गयी है।

धनुष की टंकार और चन्द्रघण्टा की शक्ति

कहते हैं कि देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) ने राक्षस समूहों का संहार करने के लिए जैसे ही धनुष की टंकार को धरा व गगन में गुंजा दिया वैसे ही माँ के वाहन सिंह ने भी दहाड़ना आरम्भ कर दिया। और माता फिर घण्टे के शब्द से उस ध्वनि को और बढ़ा दिया। जिससे धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घण्टे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएं गूंज उठीं। उस भयंकर शब्द व अपने प्रताप से वह दैत्य समूहों का संहार कर विजय हुई।

नोटः यह कथानक दुर्गासप्तशती से वर्णित है।

चंद्रघण्टा के मंत्र

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) के विविध मंत्रों को कई संदर्भों में प्राप्त किया जा सकता है। माँ की स्तुति के अनेक मंत्र दुर्गा सप्तशती के मानक ग्रंथ में है। उनके रूप लावण्य सहित उनकी प्रतिमा का वर्णन व उनके मंत्रों का वर्णन यथा स्थान प्राप्त होता रहता है। माता चंद्रघण्टा की पूजा बड़े ही विधि-विधान व श्रद्धा भाव से करना चाहिए।

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।   रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

चंद्रघण्टा महात्म्य

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) का स्वरूप और महत्व

देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) महात्म्य दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया गया है। माँ की कांति स्वर्णिम है तथा वे सिंह के ऊपर सवार होती हैं। माँ प्रचण्ड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवी हैं। तुम्हारी जय हो! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम, क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो। अर्थात् माँ दुर्गा के तृतीय रूप चंद्रघण्टा महात्म्य को बारंबार प्रणाम है।

व्रत, पूजन और लाभ

कहने का अभिप्राय है कि माता चंद्रघण्टा, माँ दुर्गा का ही रूप हैं। जिनके व्रत, अनुष्ठान और पूजन से वांछित फलों की प्राप्ति होती है। रोग, पीड़ाओं सहित कई तरह के दर्द दूर होते हैं। अतः यत्नपूर्वक नवरात्रि के पावन पर्व पर माता की अर्चना करनी चाहिए।

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माँ चंद्रघण्टा से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रश्न: तृतीय देवी चंद्रघण्टा (Mata Chandraghanta) की पूजा कब की जाती है?
उत्तर: नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघण्टा की पूजा का विधान है।

प्रश्न: माँ देवी चंद्रघण्टा (Devi Chandraghanta) का स्वरूप कैसा है?
उत्तर: इनका रूप स्वर्णिम आभा से युक्त है और वे सिंह पर सवार होकर दस भुजाओं से सुसज्जित रहती हैं।

प्रश्न: माँ चंद्रघण्टा की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
उत्तर: भय, पीड़ा और दुःख दूर होते हैं तथा साहस और शांति प्राप्त होती है।

प्रश्न: माँ चंद्रघण्टा का वाहन कौन सा है?
उत्तर: माँ सिंह पर सवार होकर भक्तों की रक्षा करती हैं और दुष्टों का नाश करती हैं।

प्रश्न: चंद्रघण्टा देवी से जुड़ी कथा कहाँ वर्णित है?
उत्तर: इनकी कथा दुर्गा सप्तशती में विस्तार से वर्णित है।

शुभ नवरात्री 

यह भी अवश्य पढ़ें: माँ कूष्माण्डा – नवदुर्गा की चौथी शक्ति और माँ स्कन्दमाता – नवदुर्गा की पांचवी शक्ति और माँ कात्यायनी – नवदुर्गा की छठी शक्ति

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