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माँ शैलपुत्री – नवदुर्गा की पहली शक्ति

Published On : March 27, 2017  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

प्रथम देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) की उत्पत्ति और महत्व

माँ आदि शक्ति जगदम्बा सम्पूर्ण जगत के कल्याण हेतु प्रकट हुई हैं। चाहे वह राक्षस समूह की पीड़ाओं से देवताओं को छुटकारा दिलाना हो या फिर जीवन चक्र में नाना विधि दुखों से घिरे मानव को रोग, शोक और कष्टों से मुक्ति दिलाना हो, माँ भवानी का स्वरूप इतना कल्याणकारी है कि इनके दर्शन और पूजन से व्यक्ति को वांछित फलों की प्राप्ति होती है। प्रथम देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) की उत्पत्ति इसी दिव्य शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

नवरात्रि और नवदुर्गा की पूजा परंपरा

हमारे ऋषियों ने ईश्वरीय शक्ति माँ की अर्चना की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इसीलिए उन्होंने वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रों में देवी के प्रत्येक रूप की पूजा का विधान बताया है। माँ भवानी के नौ स्वरूप होने से उन्हें पुराणों में नवदुर्गा कहा गया है, जिनकी पूजा अर्चना का क्रम नौ दिनों तक चलता रहता है। नवरात्रि की प्रथम देवी शैलपुत्री को विशेष महत्व प्रदान किया गया है।

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देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) का स्वरूप और प्रतीक

माँ दुर्गा के कल्याणकारी स्वरूप में प्रथम नवरात्रि की देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) हैं। माँ जगदम्बा का प्रथम रूप शैलपुत्री अति कल्याणकारी और सुप्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इन्होंने पर्वतराज श्री हिमालय के घर में जन्म लिया और इस कारण शैलपुत्री के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुईं। माता ने अपने वाहन के रूप में वृषभ को स्वीकार किया है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल शोभायमान है। इनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।

प्रथम देवी शैलपुत्री के अन्य नाम और कृपा

प्रथम देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) भक्तों के रोग और पीड़ाओं को दूर करती हैं। इन्हें पार्वती, शैलसुता, दक्षसुता, हेमवती और शैलपुत्री जैसे नामों से भी जाना जाता है। इनके पूजन और ध्यान से भक्तों को सुख-समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

शैल पुत्री की पूजा का विधान

देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) की पूजा का विधान माँ शैल पुत्री श्री दुर्गा के प्रथम रूप के रूप में विशेष महत्व रखता है। अतः इनकी पूजा शास्त्रीय ढंग से बड़े विधान के साथ करनी चाहिए। पहले दिन माँ के निमित्त विविध प्रकार की विहित पूजन सामग्री को संग्रहित करके शौचादि क्रियाओं से निवृत्त होकर षोडशोपचार विधि से पूजा करनी चाहिए। यदि संभव हो तो दुर्गा सप्तशती का पाठ करें या करवाएं और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए। इसके बाद पूजा का समर्पण करते हुए विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिए।

देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) की कथा और पौराणिक प्रसंग

शैलपुत्री (Goddess Shaulaputri) की कथा में वर्णन आता है कि पूर्व जन्म में यह प्रजापति दक्ष की कन्या थीं। इनका विवाह अनंत अविनाशी भगवान शिव के साथ हुआ था। ऐसा पौराणिक कथानक प्राप्त होता है कि एक बार प्रजापति दक्ष कोई यज्ञानुष्ठान कर रहे थे, जिसमें सभी कन्याओं सहित संबंधित लोगों को आमंत्रित किया गया था, किन्तु भगवान शिव और पार्वती को नहीं बुलाया गया क्योंकि वह किसी कारण से शिवजी से नाराज थे।

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देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) का अपमान और आत्मदाह

समय आने पर जब सभी देवता और देवियां अपने वाहनों से यज्ञ में जाने लगे, तब माता दक्षसुता ने यह दृश्य देखकर भगवान शिव से पूछा। तब भगवान शिव ने संपूर्ण वृतांत सुनाया। यह जानकर कि यज्ञ उनके पिता दक्ष के यहाँ हो रहा है, माता ने वहाँ जाने का निश्चय किया। भगवान शिव ने बिना बुलाए न जाने की सलाह दी, किंतु माता ने कहा कि यह उनके पिता का घर है, इसलिए उन्हें जाने की आज्ञा दें। अंततः भगवान शिव ने अपने गणों के साथ उन्हें भेजा।

लेकिन वहाँ पहुँचने पर प्रजापति दक्ष ने उनका सम्मान नहीं किया। यहाँ तक कि भगवान शिव और पार्वती के लिए यज्ञ में निर्धारित भाग भी नहीं दिया गया। इससे माता को अत्यधिक ग्लानि हुई और उन्होंने उसी यज्ञ-अग्नि में अपने तेज से अपने शरीर का त्याग कर दिया।

शिव के गणों का कोप और यज्ञ का विध्वंस

इस घटना से सम्पूर्ण सभा में हाहाकार मच गया। वहाँ उपस्थित शिवगणों ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया। परिणामस्वरूप प्रजापति दक्ष को भगवान शिव के कोप का भाजन बनना पड़ा। यह घटना देवताओं और समाज में गहन प्रभाव छोड़ गई।

शैलपुत्री का पुनर्जन्म और महत्व

इसके पश्चात देवी ने हिमालय पर्वत के यहाँ पुनर्जन्म लिया और कठोर तप द्वारा भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया। इसी कारण उन्हें शैलसुता या देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) कहा जाता है। वृषभधारी भगवान शिव इनके पति हैं। माता शैलपुत्री का स्मरण करने से भक्तजन कल्याण और शुभ फल प्राप्त करते हैं।

शैलपुत्री के मंत्र

माँ शैलीपुत्री के यद्यपि अनेक मंत्र यथा स्थान विभिन्न संदर्भों में दिए गए है। अतः जरूरतों के अनुसार मंत्रों का उच्चारण व जाप किएं जाने का विधान है। माँ के कुछ उपयोगी मंत्रः-

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः। शत्रुहानि परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः। ।

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि। ।

शैलपुत्री महात्म्य — परिचय

शैलपुत्री महात्म्य
देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) के महात्म्य को यद्यपि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती में वर्णित किया गया है। यहाँ दुर्गा सप्तशती के कुछ अंश को महात्म्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है — हे देवी, हिमालय की तपस्या और प्रार्थना से प्रसन्न हो कर कृपा पूर्वक आप शैलपुत्री के रूप में प्रकट हुईं। यह घटना पुराणों में प्रसिद्ध है। वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। हिमालय-कन्या पार्वती, जिन्हें महादेव जी के द्वारा प्रशंसित होने वाली परमेश्वरी कहा गया है, तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।

शैलपुत्री महात्म्य — देवी का स्वरूप

ऊँ, सभी देवता देवी के समीप गए और नम्रता से पूछने लगे — हे महादेवी! तुम कौन हो? उन्होंने कहा — मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सदृश रूप और असद्रूप जगत् उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द-अनन्दरूपा हूँ। मैं विज्ञान और अविज्ञान रूपा हूँ। अवश्य जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पंचीकृत और अपंचीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य-जगत मैं ही हूँ।

शैलपुत्री महात्म्य — भूमिका और विस्तार

विद्या और अविद्या भी मैं हूँ, अजा और अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं हूँ। नीचे-ऊपर, अगल-बगल भी मैं ही हूँ। मैं रूद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ। मैं आदित्य और विश्वेदेवों के रूपों में विचरती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों की, इंद्र एवं अग्नि की तथा अश्विनीकुमारों की पालन-पोषण करती हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भृगु को धारण करती हूँ। त्रैलोक्य को आक्रान्त करने के लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ।

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प्रथम देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: प्रथम देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri)त्री कौन हैं?
उत्तर: प्रथम देवी शैलपुत्री नवरात्रि की पहली देवी हैं, जिनका जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था।

प्रश्न: माँ शैलपुत्री का स्वरूप कैसा है?
उत्तर: माँ शैलपुत्री वृषभ पर आरूढ़ हैं, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल है।

प्रश्न: शैलपुत्री के अन्य नाम क्या हैं?
उत्तर: इन्हें पार्वती, शैलसुता, दक्षसुता और हेमवती नामों से भी जाना जाता है।

प्रश्न: शैलपुत्री की पूजा का महत्व क्या है?
उत्तर: देवी शैलपुत्री (Devi Shailaputri) की पूजा से रोग, शोक और कष्ट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

प्रश्न: शैलपुत्री की कथा किससे जुड़ी है?
उत्तर: यह कथा प्रजापति दक्ष की यज्ञ घटना से जुड़ी है, जिसमें माता ने आत्मदाह कर पुनः हिमालय के घर जन्म लिया।

शुभ नवरात्री 

यह भी पढ़ना न भूलें: माँ ब्रह्मचारिणी – नवदुर्गा की दूसरी शक्ति और माँ चंद्रघण्टा – नवदुर्गा की तीसरी शक्ति और माँ कूष्माण्डा – नवदुर्गा की चौथी शक्ति

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