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नाग पंचमी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

नाग पंचमी तिथि है अनूठा पर्व

यह हमारे संस्कृति के सोपानों का बड़ा अनूठा पर्व है। जो परोपकार, कल्याण की भावना को बाखूब प्रस्तुत कर है, इस धरती पर प्रत्येक जीव चाहे वह मानव के लिये कितना भी घातक हो पर उसे संरक्षित एवं सुरक्षित रखने के लिये भारतीय जनमानस में धर्म प्राण ऋषियों ने धार्मिक आधार देकर उसकी पूजा प्रतिष्ठा द्वारा कहीं न कहीं कल्याण की बातों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से देखा है। नाग पंचमी का व्रत व पर्व लोगों को नाग व सर्प जाति के प्रति जहाँ आस्था एवं विश्वास दिलाने वाला होता है। वहीं इस तिथि पर लोगों को सर्प आदि विषैले जीवों से आत्मरक्षा एवं जीवन की सुरक्षा के प्रति जागरूक करने का पर्व है। कि सर्प जैसे विषैले जीव जो कि अमूमन हमें यहाँ-वहाँ दिख जाते हैं। घर, गाँव, गलियों एवं शहरों में कहीं न कहीं अकस्मात् इनके दर्शन हो जाते हैं। ऐसे में आपको इनसे बचने का भरसक प्रयास करना चाहिये। इन्हें स्पर्श करना एवं मारना नहीं चाहिये। इन्हें दूर से ही प्रणाम करके चलता बनें। जब धरती पर रिमझिम बारिश का मौसम होता है। तथा धरती के प्रत्येक कण को वर्षा भिगो देती है तब उस सावन की हरियाली में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी पर्व मनाया जाता है। क्योंकि इस दिन विधि पूर्वक इनकी पूजा करने से सर्प दंश का भय नहीं होता है। तथा कई दोषों का शमन हो जाता है। नाग हमारे देवता है। इनके संबंध में बड़े ही प्रमाणिक एवं रोचक ग्रंथ उपल्ध होते हैं। धर्म ग्रन्थों में नाग लोक आदि की बातें भी स्पष्ट तौर पर दी गई हैं। और उनकी पूजा जहाँ नाग पंचमी के दिन विशेष रूप से होती हैं। वहीं अन्य पूजा एवं अनुष्ठानों में भी नाग देवता की पूजा होती है। उनकी पूजा के बिना पूजा अपूर्ण सी बनी हुई रहती है।

नाग पंचमी व्रत एवं पूजा की विधि

व्रती साधक एवं साधिकाओं को चतुर्थी तिथि के दिन नियम एवं संयम का पालन करते हुये पंचमी तिथि के दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठकर शौचादि स्नान क्रिया विधि पूर्व करके भगवान का स्मरण करते हुये आचमन करें और अपने ऊपर जल छिड़के और फिर व्रत का भक्ति पूर्वक संकल्प लें कि हे! नाग देवता मै आपके व्रत एवं पूजन का संकल्प ले रहा हूँ। मुझे इसके निममों के पालन की शक्ति दें। तथा मुझ पर सदा दया बनायें रखें तथा मेरे जीवन से रोग भय पीड़ा आदि दूर हो मै समृद्धशाली जीवन की राह पर आगे बढ़ता हुआ रहूं। तथा मुझे या मेरे परिवार को किसी प्रकार के किसी भी जाति के सर्प एवं नाग से विष भय न रहे। तथा अन्य विषैले जीवों का भी प्रकोप मेरें एवं मेरे परिवार के ऊपर न हो। हे! देवता आप ऐसी दया करे और मेरे व्रत एवं पूजन को स्वीकार करें। ध्यान रहे यह पूजन, नाग की मूर्ति एवं नाग प्रतिमा में जो पांच फणधारी नाग हो में करना चाहये। किसी जीवत नाग एवं चलते हुये नाग से छेड़खानी एवं उसे बंधक बनाकर पूजन अर्चन नहीं करना चाहिये। क्योंकि भावों ही विद्यते दवेता का नियम श्रेष्ठ है। अश्रद्धा एवं अभाव तथा क्रोध आदि को पूजा एवं व्रत में त्याग दें। ध्यान रहे सपेरे द्वारा पकड़े गये सर्प आदि को भी आप दूध न पिलायें । क्योंकि ऐसे कुछ तथ्य सामने आ रहे हैं कि दूध पीने से सर्प की मृत्यु हो जाती है। क्योंकि पूजन में दूध का प्रयोग हो सकता है। उनकी प्रतिमा एवं मूर्ति को जल से स्नान कराने के बाद रक्षा सूत्र आर्पित करें एवं हल्दी एवं मलयागिरि चंदन एवं चम्पा के पुष्प आदि जो उन्हें विशेष प्रिय होते हैं। जिनकी खूशबू से सहज ही नाग देवता यानी सर्प खिचे चले आते हैं। इस व्रत में नाग देवता की पूजा आदि करने पश्चात् ब्राह्मणों एवं पुरोहितों को खीर तथा तरह-तरह के पकवान आदि खिलाने का विधान होता है। दान पुण्य से व्रतों की सफलता पुष्ट होती है।

नाग पंचमी विष भय से रक्षा करती है

हिन्दू धर्म गंथों में कई स्थानों में सर्प के विष से बचने के उपाय सर्पों के बारे में उनकी उत्पत्ति आदि की बड़ी ही रोचक कथायें भरी पड़ी है। जिसमें नाग पंचमी के बारे ऐसे कथानक प्राप्त होते हैं। कि जो व्यक्ति या स्त्री पुरूष इस पर्व में नाग देवता की पूजा आधारना विधि पूर्वक करते हैं। तथा इस तिथि में व्रत के नियमों का पालन करते हैं। उन्हें सर्प दंश एवं सर्प भय और विष नहीं व्याप्त होते है। अतः श्रद्धालुओं को भक्ति पूर्वक नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा आराधना करनी चाहिये। ऐसा भी लोकरीति में प्रचलित है कि लोग नाग पंचमी व्रत के दिन अपने दरवाजे के बाहर यानी द्वार की दीवार पर नाग देवता का चित्र गोबर या फिर गेरू आदि से बनाकर जिसमें पांच फन हो कि पूजा करते हैं। इस प्रकार से जो भी व्यक्ति भक्ति पूर्वक इस नाग पंचमी की तिथि मे विधि पूर्वक पूजन करता है। उसे विष भय नहीं होता है।

नाग पंचमी का महत्व

नाग पंचमी तिथि अपने आप में बहुत ही खास एवं महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि पंचमी तिथि के देवता ही नाग होते हैं। जहाँ यह पंचमी तिथि के स्वामी होते हैं। वहीं इस तिथि में इनका पूजन अर्चन का बड़ा ही महत्व है। इस तिथि में पूजा के द्वारा जहाँ नाग देवता का ध्यान एवं पूजन होता है। वहीं प्रकृति के द्वारा रचित प्रत्येक जीव के संरक्षण की जागरूकता प्रतिवर्ष करने का प्रयास भी होता है। क्योंकि नागों का जहाँ धार्मिक महत्व हैं। वहीं वैज्ञानिक महत्व भी बहुत अधिक होता है। क्योंकि नाग को दिव्य लोक का प्राणी माना जाता है। यदि नाग देवता प्रसन्न हो तो लोगों को जीवन में अच्छा स्वास्थ, धन, तथा संतान आदि सुख प्राप्त होते हैं। तथा पितृ एवं वास्तु दोषों से छुटकारा भी प्राप्त होता है। कुण्डली  आदि में उत्पन्न दोष भी इनके प्रभाव से दूर होते हैं। तथा कई रोगों से इनके कृपा से छुटकारा मिलता है। और मानव जीवन को अभय देने वाले होते हैं। नागों की उत्पत्ति एवं अस्तित्व बहुत ही वृहद एवं अति प्राचीन है। जिससे नाग हमारे सभी प्रमुख देवताओं के साथ निवास करते हैं और पूजे भी जाते हैं। उनका विशेष रूप से नाग लोग में निवास होता है। किन्तु वह अपने स्वेच्छा के अनुसार इधर-उधर जहाँ चाहें जिस लोग में धरती जल, पाताल एवं आकाश में स्वछंद विचरण करने वाले होते हैं।

नाग पंचमी का संबंध देवताओं से है

हमारें पुराणों में मुख्य रूप से आठ नागों को अभय देने वाला एवं कल्याणकारी माना जाता है। जिसमे अन्नत, वासुकी, शेषनाग, पद्मनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृष्टराष्ट्र, तक्षक तथा कालिया आदि नागों का उल्लेख मिलता है। नाग तीक्ष्ण विष से युक्त होने पर भी बहुत ही कल्याण करने वाले होते है। जैसे नागराज वासुकी ने समुद्र मंथन के समय जब संसार की कोई रस्सी मंदराचल पर्वत को हिला नही पा रही थी, जिससे देवताओं का महान कार्य रूकने लगा। तो उस समय नाग वासुकी ने अपने शरीर को रस्सी के रूप में अर्पित कर दिया था। इसी प्रकार शेषनाग सम्पूर्ण धरती के भार को अपने फन में धारण किये हुये हैं। वही अन्नत नाग की शैया में श्री हरि क्षीर सागर में शयन करते हुये लोगों के पालन में लगे हुये हैं। भगवान शिव शंकर तो सदैव अपने गले में नागों का धार धारण किये हुये हैं। इसी प्रकार गणेश एवं गौरी भी नागों से सुशोभित हो रहे हैं।

नाग पंचमी की कथा

इस पर्व के संबंध में कई वैदिक एवं पौराणिक कथानक आदि प्राप्त होते है। जिसमें श्रीवाराह पुराण की कथा कहती है कि परम पिता ब्रह्मा जी धरती को संतुलित रखने तथा उसके भार को धारण करने के लिये कहा था तब शेषनाग ने सहर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को समूची पृथ्वी को अपने फन में बड़े ही आश्यर्च जनक ढ़क से धारण कर लिया। जिससे धरती सुरक्षित एवं पोषित हुई इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उनकी पूजा का वरदान दिया जिससे प्रतिवर्ष नाग पंचमी बडे़ हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। यजुर्वेद   में भी नागों के बारे वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण के समय कालिया नाग के द्वारा उत्पन्न विष से व्याकुल हुये लोगों को बचाने के लिये भगवान ने कालिया का मर्दन किया था। गरूण पुराण में भी नागों के कई कथानक प्राप्त होते है। तथा नाग पूजा के संदर्भ में विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है। इसी प्रकार एक और प्रचलित कथा है जिसमें कृषक के हल के नीचे सर्पिणी के तीन बच्चे मर गए। जिससे नागिन नें उस पर तीक्ष्ण हमला कर काट लिया। किन्तु जब उसकी पुत्री को इस घटना की जानकारी हुई तो वह नागिन से क्षमा याचना करने लगी। जिससे नागिन दया भाव में आकर उसे जीवन दान दिया। तब से प्रतिवर्ष नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान चल रहा है। इस नाग पंचमी के पर्व में भारत वर्ष में कई स्थानो में मेलों एवं कुश्तियों को आयोजन किया जाता है। जिसमें उत्तर-प्रदेश में नैमिष में और वाराणसी में बडे मेलों का आयोजन एवं नाग पूजा आदि का विधान होता है। इस प्रकार कई स्थानों में यह विशाल रूप से मनाया जाता है। तथा रंग-विरंगी गुड़िया को सजाकर लोग नदियों व सरोवरों के किनारें उनका विसर्जन आदि करते हैं। नागों के बारे उनके मणि की कथा प्रचलित है। जो हमें अमूल्य विचारों के संचयन और उनके अमल का परम संदेश देती है।

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