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नवदुर्गा का शक्ति पर्व नवरात्री

Published On : March 6, 2017  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

अजेय शक्ति का स्रोत हैं, भगवती दुर्गा माँ की पूजा

नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) और नवरात्रि पर्व (Navratri Festival)

।। ऊँ नमश्चण्डिकायै।।

भारत भूमि एक पवित्र संस्कृति से सम्पन्न कर्म भूमि ही नहीं, बल्कि देव भूमि भी है, जहाँ देवी-देवताओं के अवतरण की कई महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं सुविख्यात हैं। सम्पूर्ण विश्व, सूर्यादि ग्रह, नक्षत्र तथा पंच तत्व सहित नाना विधि संसार सत्ता के सर्वोपरि इच्छा द्वारा ही चलायमान हैं। यह ध्रुव सत्य है कि बिना सर्वोपरि शक्ति (परम ब्रह्म) की इच्छा के कुछ भी संभव नहीं है। आज भले ही आधुनिकता की चकाचौंध में कुछ लोग अपनी अज्ञानता को बलपूर्वक थोपने की कोशिश कर रहे हों कि देवी-देवता नाम की कोई सत्ता व ताकत नहीं है, किन्तु यह सच है कि कहीं न कहीं उन्हें सर्वोपरि सत्ता का एहसास अवश्य होता है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म भी कहा जाता है, जो आदि काल से है।

इसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति व उसके विस्तार की विशुद्ध जानकारी प्राप्त होती है। हमारे पौराणिक व वैदिक धर्म ग्रंथ इस बात के गवाह हैं कि जब-जब धरा में धर्म की क्षति होती है तथा दुराचार, अपराध रूपी असुरों की वृद्धि होती है, तो भगवान विभिन्न शरीरों में उत्पन्न होकर उनका संहार करते हैं, सज्जनों की पीड़ा हरते हैं और धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यही संदेश हर वर्ष मनाए जाने वाले नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में मिलता है।

दुर्गा पूजा का अवसर न गँवाएँ, अभी बुक करें और माँ दुर्गा की कृपा से अपने जीवन को सुख-समृद्ध करें।

महिषासुर वध और माँ दुर्गा की उत्पत्ति

इसी प्रकार जब महिषासुरादि दैत्यों के अत्याचार से समस्त भू व देव लोक पीड़ित हो उठा तो परमपिता परमेश्वर की आज्ञा से देवगणों ने एक अद्भुत अजेय शक्ति का सृजन किया। उन्होंने उसे नाना विधि अमोघ अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और उसे अजेय तथा जनकल्याणकारी बना दिया। यही शक्ति आदि शक्ति माँ जगदम्बा के नाम से अखिल ब्रह्माण्ड में सुविख्यात हुईं।

माँ दुर्गा न केवल देव व भू लोक की रक्षक हैं, बल्कि सभी के लिए वांछित कल्पतरु के रूप में पूजित हैं। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) इन्हीं दिव्य स्वरूपों और उनकी अद्भुत शक्तियों की स्मृति और आराधना का पर्व है।

शक्ति और शिव का महत्व

शिव व शक्ति की परम कल्याणकारी कथाओं का अति मनोरम वर्णन देवी भागवत, सूर्य, शिव, श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में है। बिना शक्ति की इच्छा के इस संसार में एक कण भी नहीं हिल सकता। सर्वज्ञ दृष्टा भगवान शिव भी शक्ति के हटते ही शव (मुर्दा) स्वरूप हो जाते हैं। यही कारण है कि नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में शिव और शक्ति के अभिन्न संबंध की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

माँ दुर्गा की नौ रूपों में प्रकटता

भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में जयंती, मंगलाकाली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा के रूप में प्रकट होकर अहंकार में डूबे हुए शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, रक्तबीज जैसे अनेकों दैत्यों का वध किया। उन्होंने देवताओं को उनका यज्ञभाग पुनः दिलाया तथा भू और देव लोक में धर्म की स्थापना कर मानव का परम कल्याण किया।

माँ दुर्गा की पूजा का महत्व

हमारे शुभेच्छु वैदिक ऋषियों ने कल्याण प्राप्त करने हेतु मानव को इच्छित फल के लिए माँ दुर्गा की पूजा अर्चना का क्रम बताया है। इसमें राजा सुरथ से महर्षि मेधा ने कहा था – आप उन्हीं भगवती की शरण ग्रहण कीजिए जो आराधना से प्रसन्न होकर मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं। इसी अनुसार अर्चना करके राजा सुरथ ने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया। जब से देवताओं ने अपने तप व तेज का संग्रह करके अद्भुत दिव्य रूपी माँ दुर्गा को अवतरित किया, तब से आज तक अनगिनत लोगों ने माँ दुर्गा की अर्चना करके मनोवांछित फल प्राप्त किया। इसी अनुसार अर्चना करके राजा सुरथ ने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया। तब से आज तक अनगिनत लोगों ने नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के अवसर पर माँ दुर्गा की पूजा कर मनोवांछित फल प्राप्त किए हैं।

देवी आराधना का महत्व

मनुष्य क्या, माँ दुर्गा की अर्चना तो देव समूह भी करते हैं। साक्षात प्रभु श्रीराम ने भी जगज्जननी भगवती की आराधना नवरात्रों के विशेष पर्व में कर दुष्ट रावण का वध किया था। यह परंपरा आज भी नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के दौरान पूरे उत्साह और श्रद्धा से निभाई जाती है।

नवरात्रि पर्व (Nav Durga Mahotsav) और परंपरा — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

सम्पूर्ण भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को प्रतिवर्ष नवरात्रि के पर्व को भगवती की आराधना करके मनाया जाता है। इसे वसंत और शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त दो गुप्त नवरात्र भी होते हैं।

कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महत्वपूर्ण पर्व दुर्गा अर्चना के होते हैं। शरद ऋतु का आगमन कृषि प्रधान भारत देश के लिए एक उत्सव के समान है। इन दिनों रबी की फसलों की बुआई का प्रारम्भ हो जाता है तथा खरीफ की फसल भी समृद्धि (धान्य) की सूचना देती है।

इसलिए कृषक वर्ग सहित समूचा भारतवर्ष प्रसन्न होकर परम कल्याणकारी शक्ति स्रोत माँ जगज्जननी की नौ दिन पर्यन्त वैदिक रीति से आराधना करता है। इसी कारण इसे नौ रात्रि कहा जाता है। यही है नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) का असली स्वरूप, जिसके परिणामस्वरूप मानव दुःख, दरिद्रता, रोग और बाधाओं से मुक्त होकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है।

माँ दुर्गा की कृपा पाने और जीवन से संकट, बाधाएँ व नकारात्मकता दूर करने हेतु नव चंडी पाठ का आयोजन करवाएँ। यह विशेष अनुष्ठान आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने का अद्भुत उपाय है।

नवरात्रों का प्रारम्भ और कलश स्थापन 2025

प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष नवरात्रों का प्रारम्भ और कलश स्थापन 22 सितम्बर 2025 विक्रमी संवत् 2082, दिन सोमवार, तिथि शुक्ल पक्ष से हो रहा है। माँ “जगज्जननी” की अर्चना का सबसे प्रामाणिक व श्रेष्ठ ग्रन्थ “दुर्गा सप्तशती” है।

इसमें सात सौ श्लोकों के माध्यम से देवी से प्रार्थना की गई है। इस पाठ के प्रभाव मात्र से माँ साधकों को इच्छित फल देती हैं। ऐसे साधक जिनके पास कम समय है या वे स्वयं ही कम समय में पाठ सम्पन्न करना चाहते हैं, तो सात सौ श्लोकों के स्थान पर “सप्तश्लोकी दुर्गा” का पाठ करके मनोवांछित फल हासिल कर सकते हैं।

इसी वैदिक परंपरा का अनुसरण हर वर्ष नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में किया जाता है।

पहला नवरात्र और माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

पहला नवरात्र – विक्रम संवत 2082, वसंत ऋतु, आश्विन मास, 22 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष प्रतिपदा, दिन: सोमवार।
कलश स्थापना और पूजा का मुहूर्त प्रातः 06:09 से 08:05 बजे तक है (कुल शुभ मुहूर्त समय: 1 घंटा 56 मिनट)। इसके अतिरिक्त दोपहर के अभिजीत मुहूर्त (11:48 से 12:37 बजे तक) में भी पूजा शुभ मानी जाएगी। इस दिन की अधिष्ठात्री देवी हैं माँ शैलपुत्री (प्रतिपदा तिथि के अनुसार)। इस दिन की अधिष्ठात्री देवी हैं माँ शैलपुत्री। यह दिन नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) की शुरुआत का प्रतीक है।

दूसरा नवरात्र और माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति

दूसरा नवरात्र – 23 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष द्वितीया, दिन: मंगलवार।
इस दिन की देवी हैं माँ ब्रह्मचारिणी (द्वितीया तिथि के अनुसार)। भक्तजन इस दिन माँ ब्रह्मचारिणी के रूप में माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति की आराधना करते हैं और उनसे बल, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करते हैं।

तीसरा नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

तीसरा नवरात्र – 24 और 25 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष तृतीया, दिन: बुधवार और गुरुवार।
इस दिन की अधिष्ठात्री देवी हैं माँ चंद्रघंटा (तृतीया तिथि के अनुसार)।

चौथा नवरात्र और माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति

चौथा नवरात्र – 26 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष चतुर्थी, दिन: शुक्रवार।
इस दिन की देवी हैं माँ कूष्माण्डा (चतुर्थी तिथि के अनुसार)। वे माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं और अपने भक्तों को बल तथा आध्यात्मिक ऊर्जा का आशीर्वाद देती हैं।

पाँचवाँ नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

पाँचवाँ नवरात्र – 27 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष पंचमी, दिन: शनिवार।
इस दिन की देवी हैं माँ स्कंदमाता (पंचमी तिथि के अनुसार)।

छठा नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति

छठा नवरात्र – 28 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष षष्ठी, दिन: रविवार।
इस दिन की देवी हैं माँ कात्यायनी (षष्ठी तिथि के अनुसार), जो माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति का स्वरूप मानी जाती हैं।

सातवाँ नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति  — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

सातवाँ नवरात्र – 29 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष सप्तमी, दिन: सोमवार।
इस दिन की देवी हैं माँ कालरात्रि (सप्तमी तिथि के अनुसार)।
भक्त माँ कालरात्रि की पूजा माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति के रूप में करते हैं। वे साहस, रक्षा और नकारात्मक शक्तियों के विनाश की प्रतीक हैं।

आठवाँ नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति

आठवाँ नवरात्र – 30 सितम्बर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष अष्टमी, दिन: मंगलवार।
इस दिन की देवी हैं माँ महागौरी (अष्टमी तिथि के अनुसार)।
विश्वास है कि इस दिन माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति अत्यंत प्रबल रूप से प्रकट होती है और भक्तों को शांति, समृद्धि तथा पापों से मुक्ति का आशीर्वाद देती हैं। अष्टमी की पूजा को विशेष शुभ माना जाता है।

नवाँ नवरात्र – माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति

नवाँ नवरात्र – 1 अक्टूबर 2025, तिथि: शुक्ल पक्ष नवमी, दिन: बुधवार।
इस दिन की देवी हैं माँ सिद्धिदात्री (नवमी तिथि के अनुसार)।

नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व

प्रथम नवरात्रि पर्व (Nav Durga Mahotsav) प्रतिपदा से नवमी तक प्रत्येक दिन माँ की पूजा सभी मण्डलस्थ देवी-देवताओं सहित षोडशोपचार विधि से बड़े श्रद्धा और भक्ति के साथ करें। पूजा सम्पन्न होने के पश्चात् प्रसाद वितरित करें तथा नव कन्याओं को साक्षात देवी का प्रतिरूप मानते हुए और एक बालक को खीर, हलुआ, पूरी आदि का भोजन श्रद्धा सहित करवाकर उन्हें वस्त्र, आभूषण, द्रव्य आदि भेंट दें। यदि आप व्रत रखते या रखती हैं, तो आपका पारण दशमी के दिन होगा।

माँ जगदम्बा के नव रूप — नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav)

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।     

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाष्टमम्।।    

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।।

इन नौ स्वरूपों की पूजा और वंदना ही नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) का केंद्र है।

माँ शैलपुत्री का स्वरूप

माँ जगदम्बा का प्रथम रूप शैलपुत्री के नाम से सुप्रसिद्ध है। इन्होंने पर्वतराज श्री हिमालय के यहाँ जन्म लिया तथा यह शैलपुत्री के नाम से सुविख्यात हुई। इन माँ का वाहन वृषभ (बैल) है। इन्होंने दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएँ हाथ में पद्म (कमल) को धारण किया हुआ है। इनकी कथा और कृपा बड़ी ही रोचक हैं, जिन्हें देवी भागवत आदि पुराणों में पढ़ा जा सकता है।

माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप

माँ जगदम्बा के दूसरे रूप को माँ ब्रह्मचारिणी के रूप में जाना जाता है। इन्होंने दिव्य तप का अनुसरण कर दैत्यों के समूह को नष्ट किया तथा भक्तों पर वरद हस्त रखे हुए हैं। यह कृपा और दया की परम मूर्ति हैं। इन्होंने दाहिने हाथ में माला तथा बाएँ हाथ में कमण्डलु को धारण किया है।

माँ चंद्रघण्टा का स्वरूप

माँ जगदम्बा के तीसरे स्वरूप को चंद्रघण्टा के नाम से जाना जाता है। यह भक्तों को अभय देने वाली तथा परम कल्याणकारी हैं। यह दानवों व राक्षसों को नष्ट कर धर्म की रक्षा करती हैं। इनके मस्तक पर घण्टे के रूप में अर्धचन्द्र विराजित हो रहा है। यह चंद्रघण्टा के नाम से अखिल जगत में प्रसिद्ध हैं। इनके दस हाथ हैं और खड्ग आदि अस्त्रों को धारण किए हुए हैं तथा सिंह पर सवार हैं। यह भयानक घण्टे की नाद मात्र से शत्रु व दैत्यों का वध करती हैं।

माँ कूष्माण्डा का स्वरूप

माँ जगदम्बा का चतुर्थ रूप कूष्माण्डा के नाम से सुविख्यात है। यह संसार के सभी जीवों पर दया करने वाली हैं, जो सूर्य लोक की वासी हैं। यह अति तेज से प्रकाशित हैं। अखिल ब्रह्माण्ड की जननी होने के कारण इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। माँ अष्टभुजाओं से युक्त हैं तथा हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल, पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा लोक कल्याण हेतु धारण कर रखे हैं। यह सिंहारूढ़ हैं तथा शत्रु, रोग, दुःख और भय को दूर करने वाली हैं।

माँ स्कन्दमाता का स्वरूप

माँ जगदम्बा के पाँचवे रूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। यह भगवान स्कन्द की माता हैं। इन्होंने दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद लिया हुआ है। यह पद्म पुष्प, वरमुद्रा से युक्त हैं तथा भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली हैं।

माँ कात्यायनी का स्वरूप

माँ जगदम्बा का षष्ठम स्वरूप कात्यायनी के नाम से सुविख्यात है। यह महिषासुर का मर्दन करने वाली हैं। जो साक्षात् त्रिदेवों (ब्रह्म, विष्णु, महेश) के अंश से प्रकट हुई हैं। परम तेजस्वी माँ कात्यायनी की पूजा सबसे पहले महर्षि कात्यायन ने की, तब से यह कात्यायनी के नाम से सुप्रसिद्ध हैं। माँ चार भुजाओं वाली हैं। यह अभय मुद्रा, वरमुद्रा, तलवार तथा कमल पुष्प को अपने हाथों में धारण किए हुए हैं। यह सिंहारूढ़ हैं तथा भक्त को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष और मनोवांछित फल देती हैं। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा साहस और विजय प्राप्ति के लिए की जाती है।

माँ कालरात्रि का स्वरूप

कालरात्रि माँ भगवती का सातवां रूप है। भक्तों के हितार्थ माँ अति भयानक कालरात्रि के रूप में प्रकट होती हैं। माँ चार भुजाओं और त्रिनयन स्वरूप वाली हैं, जो अत्यंत भयंकर व अतिउग्र हैं। यह घने अंधकार की तरह हैं। इनकी नासिकाओं से अग्नि की अति भयंकर ज्वालाएं प्रकट हो रही हैं। यह गर्दभारूढ़ हैं। इनके पूजन से सभी प्रकार के कष्ट और रोग दूर होते हैं व सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

माँ महागौरी का स्वरूप

माँ भवानी आठवें स्वरूप में महागौरी के रूप में प्रकट हुई हैं। यह चंद्र और कुन्द के फूल की तरह गौरवर्ण हैं। इसी कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। माँ चार भुजाओं वाली वृषभ पर आरूढ़ हैं। यह अभयमुद्रा, वरमुद्रा, त्रिशूल तथा डमरू को अपने हाथों में धारण किए हुए हैं तथा कठोर तप से भगवान शंकर को प्राप्त किया था। इनकी आराधना से भक्तों को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।

माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप

भवानी दुर्गा का नवां स्वरूप माँ सिद्धिदात्री का है। यह सभी सिद्धियों को देने वाली हैं। माँ चतुर्भुजी हैं जो कमल के आसन पर विराजित हैं। यह सिंहारूढ़ हैं तथा अपने हाथों में चक्र, गदा, शंख और कमल को धारण किए हुए हैं। यह सर्वसिद्धि देने वाली और कष्टों को दूर करने वाली हैं। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के अंतिम दिन उनकी पूजा से भक्तों को पूर्णता और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

माँ दुर्गा की असीम कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए करें नव चंडी पाठ। यह पाठ नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है, रोग-शोक दूर करता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।

वैदिक रीति से दुर्गा पाठ का फल व महत्व

जो साधक सम्पूर्ण वैदिक रीति से भगवती दुर्गा की आराधना किसी ब्राह्मण द्वारा प्रति वर्ष करवाता है, उसके घर व जीवन से घने तिमिर का नाश हो जाता है। उसकी अविद्या, दरिद्रता, विष जैसे- भांग, अफीम, धतूरे का विष तथा सर्प, बिच्छू आदि का विष समाप्त हो जाता है। मंत्र-यंत्र, कुलदेवी, देवता, डाकिनी, शाकिनी, ग्रह, भूत, प्रेतबाधा, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, चोर, लुटेरे, अग्नि, जल, शत्रु भय से मुक्ति मिल जाती है। स्त्री, पुत्र, बांधव, राजा से पीड़ा हो तो छुटकारा मिलता है। ये सभी बाधाएं शांत हो जाती हैं। रोटी-रोजगार में तरक्की प्राप्त होती है तथा संतान के वैवाहिक कार्यों में सफलता प्राप्त होती है व रोगों का नाश होता है। आदि अनेकों मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ और वैदिक रीति से पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।

पूजा का संक्षिप्त एवं सरल विधान

माँ दुर्गा की पूजा में शुद्धता, संयम और ब्रह्मचर्य अति महत्वपूर्ण है। इस पूजन में कलश स्थापना राहुकाल, यमघण्ट काल में नहीं करनी चाहिए। नौ दिन पर्यन्त घर व देवालय को विविध प्रकार के मांगलिक सुगंधित पुष्पों और विविध प्रकार के पत्तों से आलंकृत करना चाहिए। सर्वतोभद्र मण्डल, स्वास्तिक, नवग्रहादि, ओंकार आदि की स्थापना शास्त्रोक्त विधि से ही करना चाहिए। तथा स्थापित सभी देवी-देव समूहों का आवाह्न उनके “नाम मंत्रों” द्वारा करके, षोडशोपचार विधि से अर्चना करनी चाहिए। इस परंपरा को नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में विशेष रूप से महत्व दिया जाता है।

अखण्ड ज्योति का महत्व

इस पूजा में नौ दिन तक अखण्ड ज्योति जलाने का विधान भी है। अतः साधकों को इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि दीप हमारा कर्म साक्षी है, अतः उसे साक्षात् ब्रह्म का प्रतिरूप मानना चाहिए। इसलिए अखण्ड ज्योति में शुद्ध देसी घी या गाय का देशी घी प्रयोग में लेना चाहिए। अखण्ड ज्योति को सर्वतोभद्र मण्डल के अग्निकोण में स्थापित करने का विधान होता है। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में अखण्ड ज्योति का विशेष महत्व माना गया है।

व्रत विधानम्

नवरात्रों में श्रद्धालु भक्त व्रत करते हैं। इसमें पहले, अंतिम और पूरे नौ दिनों तक व्रत रखने का विधान है। व्रत में केवल शुद्ध व सात्विक भोजन करना चाहिए। प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन वर्जित है।

नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्णता के समय नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है। इन्हें साक्षात् नौ देवी रूप माना जाता है। अतः उन्हें श्रद्धापूर्वक भोजन और दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में व्रत का पालन आत्मशुद्धि और देवी कृपा का प्रमुख साधन है।

नौ रात्रि व्रत में खाने योग्य खाद्य पदार्थ

व्रत के दौरान आलू, सिंघाड़े का आटा, फलों (आम, केले, संतरे, सेब, अंगूर आदि) और सूखे मेवे (काजू, अखरोट, बादाम, किशमिश आदि) का सेवन करना उत्तम है।

साथ ही देसी गाय का घी, साबूदाना और कुट्टू के आटे से बने पकवान व्रत के लिए उपयुक्त हैं। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में इन पदार्थों का सेवन शुद्धता और सात्त्विकता बनाए रखने के लिए आवश्यक माना गया है।

नवरात्रि व्रत (Nav Durga Mahotsav) के समय क्या न करें

नवरात्रि व्रत के समय यह न करें अर्थात् इन पदार्थों को दृढ़ता से त्याग करें, जैसे- पेय, कोक, टॉफियां, लहसुन, प्याज, नमक, मांस, मिर्च, मसाले, मद्य, सिगरेट, तंबाकू, गुटखा आदि तामसिक खाद्यों का प्रयोग व्रत को भंग कर देते हैं। इसके अतिरिक्त व्रत पालन के समय क्रोध, चिंता, आलस्य कदापि न करें। सुगंधित तेल, साबुन के प्रयोग और क्षौर कर्म से बचना चाहिए।

नवरात्रि में रंगों का महत्व

हर दिन का एक विशेष रंग होता है, जो साधक के मनोबल और जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। पहले दिन सफेद और लाल, दूसरे दिन पीच और हल्का पीला, तीसरे दिन लाल, चौथे दिन सफेद और नीला, पाँचवें दिन लाल और सफेद, छठे दिन हरा, सातवें दिन लाल और नीला, आठवें दिन लाल, पीला, सफेद और गुलाबी, और नवें दिन सफेद व लाल रंग शुभ माने गए हैं।

इन रंगों का चयन पूजा और व्रत के दौरान सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। यही कारण है कि नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में प्रतिदिन का विशेष रंग साधकों को मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है।

संक्षिप्त पूजन सामग्री का विवरण

रौली 250 ग्राम, मौली-11, शुद्ध देशी गाय का घी, पंचमेवा, पंचपात्र, कलश के लिए सोने, चाँदी, तांबे या मिट्टी का घड़ा (जो प्राप्त हो), अखण्ड ज्योति हेतु दिया, जनेऊ, सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची, नारियल कच्चा, नारियल सूखा, अक्षत (चावल), गोलागिरी, चीनी बूरा, सुगन्धित धूप, अगरबत्ती, केसर, श्रृंगार की सामग्री, साड़ी, दूध, दही, शहद, रंग-लाल, पीला, हरा, काला आदि, पंचरत्न, पंचगव्य, पंचपल्लव, लाल पुष्प, अष्टगंध, कपूर, जौ, काले तिल, रूई, मीठा, 5 मीटर लाल व सफेद कपड़ा, पांच प्रकार के फल, ब्राह्मणों के लिए पंच वस्त्र और सोने, चाँदी या ताँबे के पात्र आदि।

जौ बोने के लिए गंगाजी की रेता। बैठने के लिए आसन, जिसमें कपड़ा न लगा हो, ऊनी हो या फिर मृग अथवा बाघ की खाल का हो तो शुभ है।

महत्वपूर्ण नोट

हवन सामग्री पूर्णाहुति से दो दिन पहले ही एकत्र करनी चाहिए।
श्रीगणेश जी को तुलसी और दुर्गा जी को दुर्वा अर्पित करने का विधान नहीं है।

ये नियम और निषेध इसीलिए बताए गए हैं ताकि भक्तजन नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के दौरान शास्त्रोक्त विधि से ही पूजन करें और सर्वोत्तम फल प्राप्त करें।

निषेध

श्रीगणेश जी को तुलसी और दुर्गा जी को दुर्वा (हरी घास) चढ़ाने का विधान नहीं है।

पूजा का कृत्य प्रारम्भः– प्रातःकाल नित्य स्नानादि कृत्य से फुरसत होकर पूजा के लिए पवित्र वस्त्र पहन कर उपरोक्त पूजन सामग्री व श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक ऊँचे आसन में रखकर, पवित्र आसन में पूर्वाविमुख या उत्तराभिमुख होकर भक्तिपूर्वक बैठे और माथे पर चन्दन का लेप लगाएं, पवित्री मंत्र बोलते हुए पवित्री करण, आचमन, आदि को विधिवत करें। तत्पश्चात् दायें हाथ में कुश आदि द्वारा पूजा का संकल्प करे। आज ही नवरात्री मे नवदुर्गा पूजन हेतु अपना स्थान सुरक्षित करे |

सभी प्रकार की कामनाओ हेतु

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।

अगर आप की अनावश्यक विलम्ब हो रहा है तो इस मंत्र का प्रयोग करते हुए पाठ करे

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।

रोग से छुटकारा पाने के लिए

रोगानषेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

षड़षोपचार पूजन करने की विधि

निम्न मंत्रों से तीन बार आचमन करें।

मंत्र- ऊँ केशवाय नमःऊँ नारायणाय नमःऊँ माधवाय नमः

तथा हृषिकेषाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।

आसन धारण के मंत्र- मंत्र-ऊँ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।

पवित्रीकरण हेतु मंत्र – मंत्र- ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षंतद्बाह्याभ्यन्तरं  शुचि।।

चंदन लगाने का मंत्रः- मंत्र- ऊँ आदित्या वसवो रूद्रा विष्वेदेवा मरूद्गणाः। तिलकं ते प्रयच्छन्तु  धर्मकामार्थसिद्धये।।

रक्षा सूत्र मंत्र – (पुरूष को दाएं तथा स्त्री को बांए हाथ में बांधे)

मंत्रः- ऊँ येनबद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।तेनत्वाम्अनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।

दीप जलाने का मंत्रः- मंत्र- ऊँ ज्योतिस्त्वं देवि लोकानां तमसो हारिणी त्वया। पन्थाः बुद्धिष्च द्योतेताम् ममैतौ तमसावृतौ।।

संकल्प की विधिः- ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ऊँ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरूषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराद्र्धे श्रीष्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे- ऽष्टाविंषतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे ………………..श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकषर्मा अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो……………….. आदि मंत्रो को शुद्धता से बोलते हुए शास्त्री विधि से पूजा पाठ का संकल्प लें।

प्रथमतः श्री गणेश जी का ध्यान, आवाहन, पूजन करें।

श्री गणश मंत्रः- ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय  सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकायेषु  सर्वदा।।

कलश स्थापना के नियम

पूजा हेतु कलश सोने, चाँदी, तांबे की धातु से निर्मित होते हैं। असमर्थ व्यक्ति मिट्टी के कलश का प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे कलश चुनें जो अच्छी तरह पक चुके हों, जिनका रंग लाल हो और जो कहीं से टूटे-फूटे या टेढ़े न हों। दोष रहित कलश को पवित्र जल से धोकर गंगा जल आदि से पूरित करें।

कलश के नीचे पूजागृह में रेत से वेदी बनाकर जौ या गेहूं बोएं और उसी में कलश कुम्भ की स्थापना मंत्र उच्चारण करते हुए करें। कलश कुम्भ को विभिन्न प्रकार के सुगंधित द्रव्य और वस्त्राभूषण अंकुर सहित पंचपल्लव से आच्छादित करें। पुष्प, हल्दी, सर्वोषधि और अक्षत को कलश के जल में डालें।

कुम्भ के मुख पर चावलों से भरा पूर्ण पात्र तथा नारियल स्थापित करें। अंत में सभी तीर्थों के जल का आवाहन कुम्भ कलश में करें।

कलश स्थापन मुहूर्त:

22 सितम्बर 2025 विक्रमी संवत् 2082, दिन सोमवार, तिथि शुक्ल प्रतिपदा से हो रहा है जो प्रात: 06:19 के बाद अभिजीत मुहूर्त मे लगभग दोपहर 11:48 से 12:37 तक रहेगा।

आवाहन मंत्र करें: –ऊँ कलषस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी  सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू ।।

षोडषोपचार पूजन प्रयोग विधि –

(1) आसन (पुष्पासनादि)-

ऊँ अनेकरत्न-संयुक्तं नानामणिसमन्वितम्। कात्र्तस्वरमयं  दिव्यमासनं  प्रतिगृह्यताम्।।

नवरात्रि पूजन की शुरुआत में आसन का विशेष महत्व है। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में देवी को पुष्पासन अर्पित करना श्रद्धा का प्रथम चरण माना जाता है।

(2) पाद्य (पादप्रक्षालनार्थ जल)

ऊँ तीर्थोदकं निर्मलऽच सर्वसौगन्ध्यसंयुतम्। पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगृह्यताम्।।

(3) अघ्र्य (गंध पुष्प्युक्त जल)

ऊँ गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं अध्र्यंसम्मपादितं मया।गृह्णात्वेतत्प्रसादेन अनुगृह्णातुनिर्भरम्।।

(4) आचमन (सुगन्धित पेय जल)

ऊँ कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु षीतलम्। तोयमाचमनायेदं पीयूषसदृषं पिब।।

(5) स्नानं (चन्दनादि मिश्रित जल)

ऊँ मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागरूवासितैः।पयोभिर्निर्मलैरेभिःदिव्यःकायो हि षोध्यताम्।।

(6) वस्त्र (धोती-कुत्र्ता आदि)

ऊँ सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे। मया सम्पादिते तुभ्यं गृह्येतां वाससी षुभे।।

(7) आभूषण (अलंकरण)

ऊँ अलंकारान् महादिव्यान् नानारत्नैर्विनिर्मितान्। धारयैतान् स्वकीयेऽस्मिन् षरीरे दिव्यतेजसि।।

(8) गन्ध (चन्दनादि)

ऊँ श्रीकरं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। वपुषे सुफलं ह्येतत् षीतलं प्रतिगृह्यताम्।।

(9) पुष्प (फूल)

ऊँ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्त्तितः।मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पादयोरर्पितानि ते।।

(10) धूप (धूप)

ऊँ वनस्पतिरसोद्भूतः सुगन्धिः घ्राणतर्पणः।सर्वैर्देवैः ष्लाघितोऽयं सुधूपः प्रतिगृह्यताम्।।

धूप अर्पण से वातावरण शुद्ध और सकारात्मक बनता है। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में यह शांति और पवित्रता का प्रतीक है।

(11) दीप (गोघृत)

ऊँ साज्यः सुवर्तिसंयुक्तो वह्निना द्योतितो मया।गृह्यतां दीपकोह्येष त्रैलोक्य-तिमिरापहः।।

(12) नैवेद्य (भोज्य)

ऊँ षर्कराखण्डखाद्यानि दधि-क्षीर घृतानि च। रसनाकर्षणान्येतत् नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।

(13) आचमन (जल)

ऊँ गंगाजलं समानीतं सुवर्णकलषस्थितम्। सुस्वादु पावनं ह्येतदाचम मुख-षुद्धये।।

गंगा जल से आचमन करने से पूजन पूर्ण माना जाता है। यह नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) की पवित्र विधि है।

(14) दक्षिणायुक्त ताम्बूल (द्रव्य पानपत्ता)

ऊँ लवंगैलादि-संयुक्तं ताम्बूलं दक्षिणां तथा। पत्र-पुष्पस्वरूपां हि गृहाणानुगृहाण  माम्।।

(15) आरती (दीप से)

ऊँ चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्निस्तथैव च। त्वमेव सर्व-ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्।।

(16) परिक्रमाः

ऊँ यानि कानि च पापानि जन्मांतर-कृतानि च। प्रदक्षिणायाः नष्यन्तु सर्वाणीह पदे पदे।।

भागवती एवं उसकी प्रतिरूप देवियों की एक परिक्रमा करनी चाहिए।यदि चारों ओर परिक्रमा का स्थान न हो तो आसन पर खड़े होकर दाएं घूमना चाहिए।

क्षमा प्रार्थना:

ऊँ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि भक्त एष हि क्षम्यताम्।। अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात्कारूण्यभावेन भक्तोऽयमर्हति क्षमाम्।। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं तथैव च। यत्पूजितं मया ह्यत्र परिपूर्ण तदस्तु मे।।

ऊँ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पष्यन्तु मा कष्चिद् दुःख-भाग्भवेत् ।।

(सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी सर्वत्र कल्याण ही कल्याण देखें एवं कोई भी कहीं दुख का भागी न हो।)

हवन सामग्री क संक्षिप्त विवरणः-

गुगल, गिलौह जौ, तिल काले,, जटामासी, शक्कर, हवन सामग्री, समुद्री झाग, छायापात्र, पूर्णपात्र, ब्रह्मण वस्त्र, नवग्रह समिधा, चावल, देषी घी, केसू के फूल, बेलगिरी, अनारदाना, चंदन बुरादा, कमल का फूल, काली मिर्च, बादाम, पंचमेवा, कमल गट्टा, नीला थोथा, मोती, मूंगा, चांदी का सिक्का, पालक, गन्ना, खीर, हलवा, मिश्री, मक्खन, भोजपत्र, दूर्वा, अगर, तगर, सतावर, कपूर, आदि।

इन सभी वस्तुओं का प्रयोग शास्त्रों में निर्दिष्ट है। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में हवन का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है क्योंकि यह साधना को पूर्णता और पवित्रता प्रदान करता है।

हवन कुण्ड निर्माण विधि

विविध प्रकार के अनुष्ठानों में भिन्न-भिन्न प्रकार के हवन कुण्डों का निर्माण आवश्यकता के अनुसार किया जाता है, जैसे– देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा, शांति एवं पुष्टि कर्म, वर्षा हेतु, ग्रह शांति, वैदिक कर्म और अनुष्ठानों के अनुसार पाँच, सात या अधिक कुण्ड बनाए जाते हैं। इनमें वृत्ताकार, चौकोर, पद्माकार, अर्धचंद्राकार, योनिकी, चंद्राकार, पंचकोण, सप्तकोण, अष्टकोण और नवकोण वाले कुण्ड शामिल हैं।

सामान्यतः चौकोर कुण्ड का प्रयोग किया जाता है, जो त्रि-मेंखला से युक्त होता है। इसके ऊपरी मध्य भाग में योनि होती है जो पीपल के पत्ते के समान होती है। इसकी ऊँचाई एक अंगुल और चौड़ाई आठ अंगुल तक निर्धारित की जाती है। कुण्ड यदि ज़मीन में खोदकर बनाया गया हो या पहले से निर्मित हो, तो उसे हवन से दो-तीन दिन पूर्व सुंदर और स्वच्छ कर लेना चाहिए। जिन कुण्डों में दरारें हों, या कीड़े-चींटियाँ हों, उनमें हवन करना वर्जित है। कुण्ड की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। टूटा या अशुद्ध कुण्ड पाप का कारण बन सकता है। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) के दौरान हवन कुण्ड का निर्माण और शुद्धिकरण विशेष महत्त्व रखता है।

समिधा का महत्व

समिधा यानी लकड़ी को प्रयोग से पहले धूप में सुखाना चाहिए। यह सुनिश्चित करें कि वह पवित्र हो और कीट-चींटियों से रहित हो। यदि वह अशुद्ध हो तो उसका त्याग करना आवश्यक है।

पूजा की पूर्णता

पूरी वैदिक विधि का पालन करते हुए पूजा सम्पन्न करने के बाद प्रसाद वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें। यही पूर्णता भक्त को माँ दुर्गा की कृपा और मनोवांछित फल प्रदान करती है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी पवित्र ज्योतिष केंद्र के विद्वान पंडित विशेष अनुष्ठान और हवन करेंगे। भक्त इसमें शामिल होकर माँ भगवती की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। नव दुर्गा महोत्सव (Nav Durga Mahotsav) में भाग लेकर आप अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं और दिव्य आशीर्वाद पा सकते हैं।

विगत वर्षो की भांति पवित्र ज्योतिष केंद्र के विद्वान् पंडितो द्वारा आपके लिए सम्पूर्ण नवरात्र मे विशेष पूजा अर्चना एवं हवन किया जाएगा | आप भी माँ जगत जननी भगवती माता की निश्चित कृपा प्राप्ति हेतु इस विशेष पूजन मे शामिल हो सकते है | आज ही नवरात्री मे नवदुर्गा पूजन हेतु अपना स्थान सुरक्षित करे | पूजन उपरांत आपको आषिका एवं दो मुफ्त उपहार (सिद्ध दुर्गा बीसा यन्त्र ) आपके घर के पते पर भेजे जायेंगे |

पवित्र ज्योतिष केंद्र की तरफ से आपको सपरिवार नवरात्री की ढेरो शुभकामनाये एवं बधाई | माँ  भगवती दुर्गा आपकी सभी मनोकामनाए पूर्ण करे |

जय माँ दुर्गा

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