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पद्मा एकादशी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

पद्मा एकादषी व्रत एवं महत्व

यह व्रत मानव जीवन के मद एवं उसके अहंकार रूपी शत्रुओं का दमन करने वाला तथा उसे यथार्थ का ज्ञान कराने वाला होता है। क्योंकि अहंकार व अज्ञानता के तिमिर में डूबे हुये मनुष्य का पतन होने लगता है। और उसके जीवन से सुख शांति व समृद्धि गायब होने लगती है। यह व्रत भगवान विष्णू को सर्मित है। इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को आवागम (जन्म-मृत्यु) के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। इस एकादशी का व्रत सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाला है। जैसे वसंत को ऋतुराज कहा जाता है। उसी प्रकार एकादशी को व्रतों मे व्रतराज भी कहा जाता है। अतः पौराणिक कथाओं के अनुसार जो व्यक्ति स्त्री एवं पुरूष एकादशी का व्रत नहीं करते और इस तिथि में अन्न ग्रहण करते हैं। वह पाप एवं नरक के भागी बनते हैं। तथा जो एकादशी तिथि में उपवास करते हैं वह अत्यंत पुण्यफलों के भागी बनते हैं। तथा उनके पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा एकादशी कहते है। इसके अतिरिक्त इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। क्योंकि धर्म ग्रंथो के श्री हरि विष्णु इस एकादशी में एक करवट से दूसरे करवट को बदलते जिससे इसे परिवर्तनी भी कहते हैं। इस तिथि में भगवान विष्णू के वामन अवतार की पूजा अर्चना षोड़शोपचार विधि से करने का विधान होता है। जो वांछित फलों को देने वाली होती है। विष्णू एवं वराह आदि पुराणों में एकादशी के संबंध में प्रसंग प्राप्त होते हैं। जिससे इसका व्रत और भी महत्व पूर्ण हो जाता है।

पद्मा एकादशी व्रत एवं पूजा विधि

पद्मा एकादशी व्रत की पूर्व संध्या पर ही व्रती साधक चाहे वह स्त्री हो या फिर पुरूष को नियम संयम एवं आचार विचार की शुद्धता का ध्यान देना चाहिये। तथा तामसिक आहारों को विशेष रूप से त्याग कर देना चाहिये। तथा व्रत एवं व्रत के देवता भगवान विष्णू पर आस्था रखते हुये व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि एवं शौचादि क्रियाओं से फुरसत होकर इस व्रत एवं पूजन में विहित सम्पूर्ण पूजन सामग्री लेकर शुद्ध आसन पर बैठकर भगवान विष्णु का स्मरण एवं फिर आचमन आदि आत्म क्रियाओं को करते हुये आत्म शुद्धि करे तथा भगवान के वामन रूप की पूजा एवं प्रतिष्ठा करें। अपने वैभव के अनुसार भगवान की स्वर्ण एवं मृत्तिका की मूर्ति की पूजा करे।  फिर कर्मकाण्ड में निपुण ब्राह्मण से पूजा करवायें। ध्यान रहे व्रत में अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिए। तथा भगवान के गुणों को स्मरण करना चाहिये। और अनावश्यक बातों में किसी की निन्दा चुगली एवं क्रोधादि से बचना चाहिये। द्वादशी के दिन ही पारण करने का विधान होता है।

पद्मा एकादशी की कथा

इस संदर्भ में धर्मराज युधिष्ठर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था कि हे प्रभु! पद्मा एकादशी के संबंध में हमे बताये इसका क्या फल एवं विधान है। एवं इसकी कथा क्या है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें त्रेतायुग के महान बलशाली एवं धार्मिक बलि की कथा को सुनाया जो कि सत्यवक्ता, ब्राह्मण को दान देने वाला था। हालांकि उसके इन कामों में घोर अहंकार की ज्वाला प्रज्जवलित हो रही थी। वह कहता कि है ऐसा कोई जो मांगे और मै उसे न दे सकूँ। ऐसे अहंकार की ज्वाला को शांत करने के लिये भगवान ने वामन रूप धारण किया और उससे सिर्फ तीन पग भूमि मांगा और त्रिलोकी को नाप लिया था। जिससे उसे एहसास हुआ कि उससे भी बड़ा कोई है। और उसके अंहकार का अंत हो गया। दूसरी कथा मान धाता की है। जिसके राज्य में अकाल होने से उसकी प्रजा त्राहि-त्राही कर रही थी। जिससे उसे नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा। जब वह इसका कारण जानना चाहा तो उसे सर्वज्ञ ऋषियो ने बाताया कि आपके राज्य में कोई शूद्र धर्म के विरूद्ध तपस्या में लीन है। जिससे सूखा पड़ा हुआ है। तब उन्होने उन्हें पद्मा एकादशी के व्रत के पालन के संबंध में बताया गया। जिससे वह इस व्रत का पालन किया और पुनः वर्षा एवं अन्न धनादि से सम्पन्न हुआ तथा उसकी प्रजा भी खुश हुई।

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