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सूर्य षष्ठी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

सूर्य षष्ठी व्रत एवं उसका महत्व

यह भगवान सूर्य देव एवं छठ मैया के निमित्त मनाया जाने वाला बड़ा ही पुण्यफल देने वाला विशाल हिन्दू धर्म का व्रत एवं पर्व है। जो प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी एवं चैत्र शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। यह मुख्यरूप से बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित झारखण्ड एवं विश्व के अनेक देशों में और सम्पूर्ण भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहाँ भी इस व्रत के उपासक एवं सूर्य देव की भक्ति करने वाले है। इस पर्व को इस अवसर पर मनाते है। क्योंकि यह सूर्य एवं षष्ठी देवी से संबंध रखने के कारण जहाँ अति प्राचीन एवं अति वैदिक एवं पौराणिक व्रत है। वहीं यह अति श्रद्धा एवं धार्मिकता का बड़ा ही कठिन अनुष्ठान एवं व्रत है। जिसके के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन मे आरोग्यता एवं यश कीर्ति आदि प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद, विष्णु पुराण एवं रामायण, महाभारत आदि सभी कालों में सूर्य देव की पूजा एवं उपासना के प्रसंग प्राप्त होते है। चाहे देवताओं के राज्य छीछने की बात हो या फिर देवताओं के द्वारा अपने राज्य आदि हारने की बाते हो सभी बड़े कठिन समय में यानी पीड़ा एवं संकटों में पड़े हुये युग वेत्ता एवं योद्धाओं तथा भक्तों को भगवान सूर्य देव ने अभय दिया था। छठ तिथि में होने के कारण इसे सूर्य षष्ठी भी कहा जाने लगा है। जिससे इस तिथि में षष्ठी माता की भी पूजा होती है। क्योंकि सूर्य देव एवं षष्ठी देवी को भाई बहन के रूप में माना जाता है। सूर्य देव पंच देव समूहों में शामिल है। अतः किसी भी छोटी एवं बड़ी पूजा एवं हवन आदि कार्यों मे सूर्य की पूजा बिना कार्यो की सफलता में संशय बना हुआ रहता है। इस व्रत का पालन सभी स्त्री एवं पुरूष करते हैं। क्योंकि सूर्य सभी की आत्मा है। उनके बिना इस प्रकृति का संतुलन बनाना असम्भव है। अतः जल एवं ज्योति तथा हमारे प्राणों के कारण सूर्य की पूजा का बड़ा ही विशाल एवं महान पर्व है। जिसे सभी लोग बड़े ही भक्ति भाव से करते हैं। यह पर्व चार दिनों का होता है। जिससे चौथ से ही इसकी तैयारी चलने लगती है। और पवित्रता का ध्यान देते हुये सभी समय के अनुसार उपलब्ध एवं सूर्य पूजा तथा षष्ठी तिथि के लिये विहित सामाग्री फल, पुष्प मीठा तथा घर परिवार की परम्परा के अनुसार कई प्रकार के भोग तैयार किये जाते हैं। तथा व्रती साधक स्त्री एवं पुरूष बिना जल एवं अन्न ग्रहण किये हुये इस व्रत का पालन करते हैं। तथा षष्ठी के दिन अस्त होते हुये सूर्य को अर्घ्य देकर उन्हें प्रणाम करते हैं। तथा उनकी पूजा अर्चना करते है। तथा दूसरे दिन यानी सप्तमी तिथि में उगते हुये सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस पर्व पर गंगा आदि जलाशलयों की विशेष रूप से सफाई एवं साज सज्जा पर ध्यान दिया जाता है। तथा जहाँ शहरों आदि में जलाशय उपलब्ध नहीं हैं वहीं सामूहिक पूजा एवं अर्घ्यदान हेतु अस्थाई जलाशयों का निर्माण किया जाता है। जहाँ सभी एकत्रित होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देते है। तथा उनकी पूजा अर्चना करते हैं।

सूर्य षष्ठी व्रत एवं पूजा विधि

सूर्य षष्ठी व्रत में पूजा हेतु शुद्धता एवं पवित्रता का बड़ा ही महत्व है। व्रती साधक कार्तिक एवं चैत्र शुक्ल की चतुर्थी तिथि से ही व्रत की तैयारी करते है। और सूर्य पूजा में जो फल पुष्प एवं मिष्ठान तथा घर में शुद्ध रूप से निर्मित पकवानों को भगवान सूर्य नारायण को अर्पित करते हैं। तथा सम्पूर्ण कल्याण की कामना करते हैं। साथ ही राष्ट्र एवं विश्व में शांति की कामना भी करते है। तथा महिलायें बड़े भक्ति परक गीत एवं संगीत जो कि स्थानीय एवं लोक भाषा में होते हैं गाती एवं व्रतोत्सव को मनाती है।

सूर्य षष्ठी व्रत कथा

इस व्रत एवं पूजा के संबंध में हमारे धर्म शास्त्रों में कई कथा एवं कथानक मिलते हैं। जिसमें में देवताओं के युद्ध हारने और पुनः सूर्य नारायण को प्रसन्न करके। यानी षष्ठी एवं सप्तमी तिथि में सूर्योपासना करके उन्हें प्रसन्न करना तथा युद्ध में विजय होना। इसी प्रकार भगवान राम एवं माता सीता के द्वारा सूर्य षष्ठी एवं सप्तमी तिथि में सूर्य की पूजा करना आदि कथायें अत्याधिक महत्वपूर्ण है।

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