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वट सावित्री व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

वट सावित्री व्रत एवं पूजा विधि

यह व्रत भारत की नारियों के दृढ़प्रतिज्ञ होने और उनके सतित्व को आत्मसात करने की महत्वाकांक्षा का बेहद पवित्र सोपान है। जो प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह मानव जीवन की खुशहाली के लिये बहुत ही आदर्श पूर्ण व्रत है। जिसके द्वारा नारियां अपने पति के दीर्घायु की ईश्वर से प्रार्थना करती हैं। वैसे इस व्रत की तिथि के विषय में कुछ अलग मत भी मिलते हैं। जिसमे भविष्य एवं स्कंद पुराण के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को करने का निर्देश प्राप्त होता है। वही अन्य मतों के अनुसार इस व्रत को ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को मनाने की बात कही है। कुछ और विद्वानों का मत है, कि यह ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा तक तीन दिनों का व्रत एवं पर्व है। इस व्रत को विशेष रूप से स्त्रियां करती है। इसके विधि पूर्वक करने से स्त्रियों को वांछित फल की प्राप्त हेाती है। वट यानी वट वृक्ष जिसे बरगद का पेड़ भी कहते है। और उसे पूजने वाली देवी सावित्री से जुड़ने के कारण इस व्रत का नाम वट सावित्री पड़ा है। यह अति प्राचीन सनातन व्रत है। जो कि आज भी लंबा समय बीतने के बाद भी उसी रूप में मनाया जाता है। क्योंकि इस व्रत का प्रसंग मानवीय मूल्यों से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। जिससे अपने सौभाग्य को संरक्षित करने के लिये स्त्रियां आज भी बढ़-चढ़ कर इस व्रत को करती है।

वट सावित्री स्त्रियों के सौभाग्य का प्रतीक

इस वट सावित्री व्रत के संबंध में ऐसा कथानक प्राप्त होता है। जो कि स्त्रियों के सौभाग्य से जुड़ा हुआ है। जिससे आज भी स्त्रियां बहुत ही प्रसन्न मन से उत्साह पूर्वक इस व्रत को करती हैं। जिससे इसे वह अपने सौभाग्य के प्रतीक के रूप में देखती हैं। और प्रत्येक नारी जो अपने सुख एवं सौभाग्य की आकांक्षी है वह इस व्रत को प्रतिवर्ष बड़े ही श्रद्धा विश्वास के साथ करती है। समस्त पूजन की सामाग्री को एकत्रित करके वट वृक्ष के पास अपने नित्य क्रियाओं से निवित्त होकर विहित वस्तुओं को संग्रहित करके अपने सुख एवं सौभाग्य की रक्षा के लिये वट वृक्ष के पास पहुंचती हैं। इस व्रत के पीछे जो भी मान्यतायें प्रचलित हैं। वह नारियों के पति व्रत धर्म एवं सुख सौभाग्य से जुड़ी हुई है। जिससे विवाहिता स्त्रियां 16 श्रृंगारों से सजकर सौभाग्य दाता वट एवं सावित्री की पूजा अर्चना करती हैं।

वट सावित्री व्रत है संतान दाता

यह व्रत जहाँ नारियों के सुख एवं सौभाग्य को देने वाला है। वहीं निः संतान दम्पत्ति को संतान देने वाला भी है। क्योंकि इस व्रत का पूर्णिमा से संबंध होने के कारण इसका संबंध भगवान विष्णू हो जाता हैं। और पूर्णिमा तिथि में भगवान विष्णू की पूजा का बड़ा ही महत्व होता है। क्योंकि भगवान विष्णू के जितने भी भक्त हैं। वह इस तिथि को विशेष महत्वपूर्ण मानते हैं। भगवान विष्णू से इस व्रत के जुड़ने के कारण यह और भी प्रभावी एवं फल देने वाला हो जाता है। क्योंकि पूर्णिमा तिथि को जहाँ चन्द्र बल अपने पूरे अंशों के साथ प्रस्तुत होता है। वहीं श्री हरि के भक्तों को भगवान श्री हरि की कृपा भी इस तिथि को पूर्ण रूप से प्राप्त होती है। इसीलिये इसे पूर्णिमा तिथि में किया जाता है। जिससे स्त्रियों के संतान प्राप्ति के लक्ष्य भी साकार होते हैं। इस व्रत के तिथियों में भिन्नता एवं अलग मान्यतायें होने के बाद भी इसके लक्ष्य में कोई भी परिवर्तन नही होता है। इसका लक्ष्य बड़ा ही स्पष्ट है। वह सुख एवं सौभाग्य की प्राप्ति तथा संतान की प्राप्ति एवं उसकी सुरक्षा को पाना ही इस व्रत का लक्ष्य है।

वट सावित्री का महत्व

वट सावित्री व्रत में जहाँ वट को विशेष महत्व प्राप्त है। वहीं इससे जुड़ी सावित्री देवी को भी उतना ही महत्व दिया गया है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में पीपल का जितना महत्व है उतना ही बरगद का भी महत्व माना गया है। जिस प्रकार पीपल के वृक्ष में त्रिदेवों का वास माना जाता है। उसी प्रकार वट के वृक्ष में भी त्रिदेवों का वास माना जाता है। जिसमें ब्रह्म, विष्णू और महेश इन देवताओं की उपस्थिति पीपल और वट वृक्ष दोनों में ही मानी गई है। अतः इस वृक्ष के नीचे बैठकर जो भी जप, तप, पूजा आराधना की जाती है। उसका कई गुना फल प्राप्त होता है। यह वट वृक्ष जहाँ अपनी विशालता के लिये सुप्रसिद्ध है, वहीं यह लंबी आयु तक रहने के कारण भी पूज्यनीय होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी इस वृक्ष का बहुत महत्व होता है। यह वृक्ष जहाँ सदैव हरा भरा रहता है वहीं ज्येष्ठ के माह में बढ़ती धूप एवं गर्मी से मानव ही नहीं अपितु सभी जीव जंतुओं के लिये आश्रय के रूप में विद्यमान रहता है। तथा इसके फलों से जीव जंतुओं की क्षुधा की तृप्ति होती है। तथा यह कई प्रभावशाली औषधीय गुणों से भी युक्त रहता है। इन कई धार्मिक मान्यताओं के पीछे कहीं न कहीं वन व उसके वृक्षों को संरक्षित एवं सुरक्षित करने का संदेश भी है।

वट सावित्री सुहागिनों के सौभाग्य का रक्षक

वट सावित्री व्रत के पीछे जहाँ धार्मिक मान्यतायें छिपी हुई है। वहीं इसकी दार्शनिक मान्यताये भी कम नहीं है। वट वृक्ष के नीचे ही भगवान गौतम बुद्ध को आत्म ज्ञान सिद्धि हुआ था। इसी प्रकर देवी सावित्री को भी वट वृक्ष के समीप ही अपने सौभाग्य को बचाने में सफलता मिली। यह ऐसी घटनायें हैं जिनसे जनमानस इस वट वृक्ष की पूजा के लिये सहज ही खिचें चले आते हैं। और यह वट सावित्री व्रत के नाम से आज भी उतना महत्वपूर्ण है। जितना कि शुरूआती दिनों में हुआ था। अतः स्त्रियां अपने सौभाग्य की रक्षा हेतु इस व्रत का पालन बड़े-विधि विधान से करती हैं। अर्थात् वट सावित्री व्रत की पूजा में वट वृक्ष ही प्रधान देवता के रूप में पूजा जाता है। जिसमें सतनजा यानी सात प्रकार के अनाजों के साथ देवी सावित्री की प्रतिमा रखी जाती है। और वट वृक्ष का ध्यान करते हुये उसको जल से स्नान कराने के पश्चात, वस्त्र, चंदन का तिलक एवं रोली अक्षत पुष्प चढ़ाती हैं। धूप, दीप आदि जलाकर तथा फल प्रसाद आदि चढ़ाकर तथा फिर कच्चे सूत के धागे से वट वृक्ष को लपेटा जाता है। तथा गुड़ व चने के प्रसाद भी चढ़ाने का विशेष महत्व होता है। जिसे लोगों में बांटा जाता है। वट सावित्री का व्रत हिन्दू धर्म में सौभाग्यवती महिलाओं के मध्य सौभाग्य की रक्षा के कारण प्रचिलत एवं प्रसिद्ध हुआ है। हिंदू धर्म में महिलायें अपने सुख एवं सौभाग्य की रक्षा के लिये वर्ष में आने वाले कई व्रत एवं नियमों का पालन करती है। उसी क्रम में यह व्रत मनाया जाता है। क्योंकि पतिव्रत धर्म का पवित्र आचरण करने वाली देवी सावित्री ने इसी दिन अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा यमराज से की थी।

वट सावित्री की कथायें

देवी सावित्री द्वारा अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा करने तथा वट वृक्ष की पूजा की प्रमुखता के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से सुविख्यात है। जो हमारी भारतीय संस्कृति को गौरवांन्वित करने वाली है। जो इस धर्म प्राण भारत भूमि में महिलाओं के द्वारा सौभाग्य रक्षा एवं सत्यव्रत का पालन करने की बड़ी मिशाल है। यद्यपि देवी सावित्री का नाम भी वैदिक एवं धार्मिक देवियों से जुड़ा हुआ है। वट सावित्री के विषय में जो कथा है उसको संक्षिप्त रूप से समझने का प्रयास करेंगे जो इस प्रकार है प्राचीन काल में भद्र देश के राजा अश्वपति थे, जिन्हें लंबे समय तक जब कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने दुःखी होकर इसका उपाय धार्मिक एवं पाण्डित कर्मों से संबंध रखने वाले गुरूजनों से पूछा, तो उन्हें संतान प्राप्त करने के लिये कुछ विशिष्ट उपायों को सुझाया गया। जिसमें वह प्रतिदिन देव पूजन एवं हवन करते और प्रतिदिन एक लाख आहुतिओं को देने का प्रण किया और वह इस तरह का प्रण करके प्रत्येक दिन एक लाख आहुतियों को देने लगे। महाराज का यह क्रम अनवरत अठारह वर्षों तक जारी रहा है। तब उन्हें आहुत देवी सावित्री ने दर्शन देकर वरदान दिया कि तम्हें एक बड़ी दिव्य कन्या की प्राप्ति होगी। जैसे ही समय बीता तो उन्हें एक सुन्दर कन्या प्राप्त हुई और उसका नाम भी सावित्री ही रख दिया गया। माता-पिता के यहाँ रहते हुये सावित्री जैसे ही विवाह के योग्य हुई तो माता-पिता ने उसकी खूबसूरती एवं गुण धर्मों का ध्यान रखते हुये उसके योग्य वर की तलाश शुरू कर दी, किन्तु बहुत खोज-बीन करने के बाद भी वर नहीं मिलने से वह दुखी हो गये और अपनी कन्या को स्वयं ही अनुकूल वर तलाशने की आज्ञा दी। जिससे वह पिता की आज्ञा पाकर तपोवन मे जा पहुंची जहाँ साल्वदेश के राजा द्युमत्सेन अपने राज्य से च्युत होने के बाद निवास कर रहे थे। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने उनसे ही विवाह का निश्चिय किया और उन्हें पति के रूप में स्वीकार किया। इस वैवाहिक संबंध को चुनकर जब अपने पिता के पास आई तो नारद मुनि ने सावित्री के विवाह के संबंध में सत्यवान के अल्पायु होने की बात बताई और उन्हें सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी। किन्तु सावित्री ने इस सत्य को जानते हुये भी उनसे विवाह किया। नारद मुनि के द्वारा बताई गई पति के मृत्यु की तिथि को वह सदैव स्मरण रखती और जब उनके पति की मृत्यु की तिथि लगभग करीब थी तभी से सावित्री ने अपने पति धर्म एवं सौभाग्य की रक्षा के लिये घोर तप आराधना शुरू कर दी। और आराधना एवं व्रत में थी तभी उनके पति सत्यवान की मृत्यु का समय नजदीक आ गया। जिससे उनके प्राण पखेरू उड़ गये। किन्तु उन्होंने अपने तपबल से सत्यवान के प्राण लेने वाले यम देव को पहचान लिया तथा अपने तप बल एवं पतिव्रत धर्म कारण वह अपने पति के प्राण बचाने की पवित्र निष्ठा यम देव को बता चुकी थी। जिसके प्रभाव से यम देवता प्रसन्न होकर उनके पति को जीवन दान दिया और उनके सौभाग्य की रक्षा हो पाई। जिससे आज भी यह व्रत महिलाओं के लिये सुख-सौभाग्य का प्रतीक बना हुआ है।

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