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सुख समृद्धि देता है दीपावली पंचमहापर्व

Published On : October 23, 2016  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

समृद्धि का मुख्य पर्व है दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

विशालतम संस्कृति से युक्त भारत भूमि मानव जीवन को संवारने की अद्वितीय परंपराओं से युक्त है। जहाँ ऋतुओं के अनुसार प्रसिद्ध तिथि और त्यौहारों का आगमन होता रहता है, जो जल की धारा की तरह प्रवाहित होते हैं और अपवित्र तथा आतृप्त जीवन पथ पर हारे, थके और आकुल-व्याकुल प्राणियों को पवित्र और तृप्त करते रहते हैं। ऐसी महानतम संस्कृति, जो संपूर्ण विश्व के लिए पथ प्रदर्शक के रूप में सनातन धर्मी है, उससे भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व भी अभिभूत होने को उत्सुक है। ऐसे ही उत्कृष्ट और अति पवित्र कार्तिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, में दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva) की आवृत्ति होती है। जिसमें धनत्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन और भैयादूज के त्यौहार शामिल हैं, जिन्हें हम पंच महापर्व के नाम से भी जानते हैं। हमारे जीवन में इन पंच महापर्वों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जैसे पंच तत्व और पंच तिथियाँ – नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा आदि का होता है, उसी प्रकार इन पंच महापर्वों का अतिविशिष्ट स्थान है, जिसका प्रधान त्यौहार दीपावली है।

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दीपावली पंचमहापर्व का महत्व और अस्तित्व 

इन पंच महापर्वों का क्या महत्व एवं अस्तित्व है, इनके पूजन का विधान क्या है, तथा यह इस वर्ष कब और किस दिन मनाए जाएंगे? ऐसे सभी महत्वपूर्ण संदर्भों में सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत है।

धनत्रयोदशी से होती है पंचमहापर्व की शुरुआत (Deepawali Panch Maha Parva)

इन पंच महापर्वों में सबसे पहले धनत्रयोदशी आती है, जो धनार्जन की शक्ति में वृद्धि प्रदान करती है।

धन लाभ के रास्ते खोलती धन त्रयोदशी – दीपावली पंचमहापर्व

मंद गति से बढ़ती हुई शीत ऋतु जैसे-जैसे अपने पांव धरा पर पसारती है, वैसे-वैसे जनमानस में ठंडक का अहसास होने लगता है। नाना विधि पेड़-पौधों से हरित धरा को सुखद बनाने हेतु कार्तिक मास के सुप्रसिद्ध त्यौहार दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva) का आगमन होता है। इसके दो दिन पूर्व धनत्रयोदशी का महत्वपूर्ण त्यौहार आता है। दीपावली का त्यौहार मां लक्ष्मी जी के पूजन के रूप में मनाया जाता है। अतः मां लक्ष्मी के आगमन से पूर्व तन और मन को निरोग बनाने हेतु धनत्रयोदशी का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन समुद्र मंथन के समय भगवान धनवंतरि देवताओं और दैत्य समूहों के सामने प्रकट हुए थे। भगवान धनवंतरि ने लोक कल्याण हेतु आयुर्वेद के अमूल्य सिद्धांतों व दवाओं का उपयोग जनहितार्थ किया था। उन्हें देवताओं का वैद्य (डॉक्टर) कहा जाता है। भगवान धनवंतरि ने आज ही के दिन अमृत देकर देवताओं को अमरता व निरोगता प्रदान की थी। इसी कारण यह तिथि अत्यंत प्रसिद्ध हुई और प्रति वर्ष लोग इसे धनवंतरि जयंती के रूप में मनाते हैं। भगवान धनवंतरि की पूजा-अर्चना से चिकित्सा जगत में कार्यरत लोगों को ख्याति अर्जित होती है। यह केवल वैद्यों के लिए ही नहीं बल्कि आरोग्य प्रिय सभी व्यक्ति इनकी पूजा-अर्चना करते हैं। भगवती मां लक्ष्मी के स्वागतार्थ प्रत्येक व्यक्ति घर और आंगन का कोना-कोना स्वच्छ करता दिखाई देता है। चारों ओर स्वच्छ और सुंदर वातावरण के अतिरिक्त गृहस्थ जीवन को विविध सुविधाओं से युक्त रखने तथा सुख-शांति और आरोग्यता हेतु आज ही के दिन नवीन बर्तनों को खरीदा जाता है।

धर्मराज यमराज की पूजा का महत्व – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

धनत्रयोदशी के दिन धर्मराज, जिन्हें यमराज या मृत्यु के देवता के रूप में जाना जाता है, की पूजा का विधान है। जिससे वे प्रसन्न होते हैं तथा जीव की अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं। अतः इस दिन इनकी पूजा-अर्चना का विधान है। कुछ लोक-रीतियां भी अलग-अलग स्थानों में प्रचलित हैं। जैसे आज धनत्रयोदशी के दिन अपने मुख्य द्वार पर दक्षिणमुखी मिट्टी से निर्मित दीप को प्रज्वलित करके सायंकाल में रखा जाता है। तथा रात्रिकाल में शुद्धता का ध्यान रखते हुए चार बत्तियों से युक्त दीप जलाकर दीपदान और यमराज के पूजन का विधान प्रचलित है। अर्थात धनत्रयोदशी के दिन धन, आयु और आरोग्यता की कामना हेतु आज इस त्यौहार को भली-भांति श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए।

धनतेरस की तिथि और शुभ कार्य – दीपावली पंचमहापर्व

प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष धनत्रयोदशी (धनतेरस) का त्यौहार 18 अक्टूबर 2025 को शनिवार के दिन प्रदोष व्यापिनी कार्तिक कृष्ण पक्ष को धनतेरस या धनवंतरि जयंती के रूप में मनाया जाएगा। अतः इस दिन अन्न, औषधियों (दवाइयों) एवं दीपदान करना चाहिए जिससे अकाल मृत्यु का डर नहीं होता है। इस दिन सोने-चांदी के बर्तनों की खरीद करनी चाहिए, जो शुभ मानी गई है। निश्चित ही पंचपर्व में यह प्रथम पर्व अत्यंत उपयोगी है।

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रूप चतुर्दशी का महत्त्व – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

दीपावली पंचमहापर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व नरक चतुर्दशी है, जो प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। पौराणिक ग्रंथों में ऐसी कथा प्रचलित है कि इस दिन रूप लावण्य को निखारने की परंपरा है। अर्थात, यूं कह सकते हैं कि सर्द हवाओं और ठंड के चलते शारीरिक त्वचा में रूखापन आ जाता है। ऐसे व्यक्ति जिन्हें रक्त विकार होते हैं, उनकी त्वचा में खिंचाव होने के कारण हाथ और पैरों में फटना शुरू हो जाता है। अतः इस त्वचा संबंधी वेदना से बचने हेतु जनमानस को प्रति वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को सतर्क किया जाता है। तेल युक्त पदार्थों को लेप के रूप में लगाकर या तेलीय पदार्थों का प्रयोग आज से नित्य प्रति किया जाता है, जिससे चेहरे की सुंदरता खराब न हो। इसी कारण इसे नरक चतुर्दशी या सौंदर्य (रूप) चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। धन त्रयोदशी के बाद यह पंचमहापर्वों का दूसरा क्रम है।

त्वचा की सुरक्षा और धार्मिक आचरण

आज के दिन इस तिथि में गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा आदि पवित्र तीर्थों में लोग प्रातःकाल स्नान कर सम्पूर्ण शरीर पर तिलादि के तेलों का लेप करते हैं, जिससे त्वचा की सुंदरता और कोमलता बनी रहती है। क्योंकि आगामी समय में शीत की तीव्रता से त्वचा में शुष्कता अधिक हो जाती है। इसलिए इन त्वचा विकारों और रोगों से बचने हेतु तीर्थ और तेलों का सेवन किया जाता है।

पौराणिक कथा और पूजन विधि

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि प्रभु श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर का वध किया था, जिससे धरती के प्राणियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और इसी खुशी के कारण इसे प्रति वर्ष मनाया जाने लगा। नरक या रूप चतुर्दशी का त्योहार इस वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025, रविवार को होगा। इस तिथि को चंद्रोदय या सूर्योदय के समय जब चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो, तभी मनाने का विधान है। आज के दिन पितृ, देव, यम का तर्पण तथा प्रभु श्रीकृष्ण का अर्चन भी वैदिक रीति से किया जाता है, जो सभी मनोवांछित फल का दाता है।

दीपावली पूजन से मिलती है माँ लक्ष्मी की कृपा (दीपावली पूजन | दीपावली पंचमहापर्व)

पंच महापर्वों का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण त्यौहार दीपावली ही है, जो कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अमावस्या को प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। भगवान विष्णु का इस मास से संबंध होने के कारण श्री हरि प्रिया महालक्ष्मी जी इसी मास में प्रकट होती हैं। इस मास की दिव्यता और प्रकाशकता इतनी बलवती है कि निष्ठाकाल में प्रत्येक घर-आँगन के कोने-कोने से अंधकार को नष्ट कर उसे दिव्य प्रकाश से ऊर्जावान बना देती है। अमावस्या के घने अंधकार से आच्छादित धरा को छोटे-छोटे दीपमालाओं द्वारा प्रकाशित किया जाता है, जिससे माँ लक्ष्मी प्रकाशित स्थान की दिव्यता को बढ़ा देती हैं और स्थान से संबंध रखने वाले व्यक्ति के जीवन से अंधकार को मिटाती हैं।

दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva) का वैश्विक प्रभाव और पौराणिक कथाएं

इस महान ज्योर्तिमय दीपावली पर्व (Diwali Festival) की व्यापकता से भारत ही नहीं बल्कि समूचा जगत प्रभावित है, जिससे विश्व के अनेक देशों में दीपदान की प्रथा का निरंतर विस्तार हो रहा है। चाहे अमावस्या की रात्रि का घना अंधेरा हो अथवा अल्पज्ञता व मलिन विचारों का दूषण, बिना दिव्य प्रकाश और अनुपम ज्ञान के उनसे छुटकारा नहीं मिल सकता। पौराणिक ग्रंथों में वर्णन है कि आज ही के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने पापी रावण पर विजय प्राप्त कर दीपावली के ही दिन अपने पैतृक नगर अयोध्या वापस आगमन किया था। इस लंबे अंतराल के बाद श्रीराम का पुनः जन्मभूमि में सकुशल आगमन अयोध्यावासियों के लिए विशाल उत्सव के समान था। उत्साहित ग्रामवासियों ने घी के दिए जलाकर सम्पूर्ण अयोध्या को दीपों से जगमगा दिया, नाना प्रकार के मिष्ठान और भोजन प्रभु के समक्ष परोसे और सभी ने मिलकर खुशियां मनाईं।

दीपावली पंचमहापर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और आध्यात्मिक अर्थ

एक अन्य कथानक के अनुसार, आज ही के दिन श्री हरि विष्णु ने वामन रूप धारण करके दैत्यराज बलि के आधिपत्य को समाप्त कर सम्पत्ति (लक्ष्मी) को मुक्त कराया, जिससे देव समूह अति प्रसन्न हुए और उन्हें पुनः अपना साम्राज्य प्राप्त हुआ। तब से दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा। वस्तुतः यह केवल दीप प्रज्वलन का पर्व नहीं, बल्कि धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन मनुष्य ही नहीं बल्कि देवताओं को भी यश, साम्राज्य, सम्पत्ति आदि सहित महालक्ष्मी की महान कृपा प्राप्त हुई। यही कारण है कि इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस महान दीपपर्व का अर्थ यही है — “असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात् यह दीप पर्व हमारे जीवन को असत्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ाता है। यह अत्यंत शुभ, मंगलकारी, कल्याणकारी और जीवन का संकेत प्रस्तुत करने वाला ज्योर्तिमय पर्व है, जो महान रहस्यों से पूर्ण है। इसी कारण इसे महारात्रि, तमोरात्रि, प्रकाश पर्व, घोर निशा आदि की संज्ञा प्राप्त है। इस अमावस्या की घनघोर काली रात्रि में प्रकाश की एक किरण जीवन को प्रगति दे सकती है और उसमें जोश का संचार कर देती है।

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दीपावली पंचमहापर्व के अवसर पर विशेष पूजन और संकल्प

दिवाली: यह छोटी-छोटी दीप श्रृंखलाएं एक साधारण व्यक्ति के जीवन में प्रकाश फैलाकर उसे विशेष बना देती हैं और जो विशेष हैं उन्हें अति विशिष्ट बनाकर परम पद दिलाने का सामर्थ्य रखती हैं। इस रात्रि में योगी परम योग की ओर अग्रसर होते हैं, विज्ञान और तंत्र विद्याओं से संबंध रखने वाले सधे हुए प्रयोग करते हैं और उनकी क्षमताओं की पुष्टि करते हैं। इसी प्रकार वैदिक पंडित वैदिक कर्म करते हैं, विद्वान, व्यापारी, पूंजीपति, उद्योगपति, उत्पादक, सैनिक, ज्योतिषी, वैद्य और विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्रों को पुष्ट करने का दृढ़ संकल्प लेते हैं कि दीप की तरह उनका जीवन प्रकाशित रहे और संबंधित विधाओं में सबल हो तथा महालक्ष्मी की कृपा सदैव उन्हें प्राप्त होती रहे। दीपावली के दिन श्री महालक्ष्मी, कुबेर, लेखनी, बहीखाता, महाकाली, महासरस्वती और त्रिदेवियों की पूजा की जाती है, जो हमें धन, यश, शारीरिक व आत्मबल और बुद्धि प्रदान करती हैं। बिना धन, बल और बुद्धि के इस संसार में कुछ भी संभव नहीं है। अतः महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना तो आवश्यक है ही, साथ ही त्रिदेवियों की भी पूजा करने का विधान है।

दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva) का महत्व एवं पूजन

इन पंच महापर्वों — धनत्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन और भैयादूज — को मनाने के सर्वसाधारण नियम हैं, जिनमें घर और स्थानों की सफाई, शरीर और मन की पवित्रता, स्नान, उपहारों का दान, अन्नदान, धन और द्रव्य का दान, तीर्थ जलों में स्नान, तथा देवालयों और निवास स्थलों में दीपदान शामिल हैं।

सफाई: इन पंच महापर्वों को मनाने हेतु सबसे पहला नियम है प्रत्येक स्थान की सफाई करना और घर व बाहर के कोने-कोने को स्वच्छ रखना। अर्थात् अपने और आस-पास के सभी संबंधित स्थानों को — चाहे वह आपका निवास स्थान हो, मंदिर हो, कार्यालय हो, जलाशय हो, सामूहिक स्थान हो या रास्ते — सभी को पूर्णतया स्वच्छ रखना चाहिए।

तीर्थ स्नान और दीपदान का विधान (Deepawali Panch Maha Parva)

तीर्थों में स्नान: आज के दिन गंगा, यमुना आदि तीर्थों के जल से स्नान करने का विधान है। जो किसी कारणवश तीर्थ नहीं जा सकते, वे अपने घर में ही तीर्थों के जल और कुशाग्र को जल में मिलाकर स्नान कर सकते हैं।

दीपदान का विधान: अमावस्या का पर्व होने के कारण आज तीर्थों में पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध, अन्नदान, धनदान, वस्त्राभूषण और गर्म कपड़ों आदि का दान किया जाता है। दीपावली का प्रधान पर्व होने के कारण सबसे पहले गणपति आदि देवताओं, इष्ट देवता, कुल देवी-देवता के निमित्त तथा किसी सुप्रसिद्ध तीर्थ या निकटवर्ती देवालय में शुद्ध देशी घी से दीपदान करना चाहिए। तदुपरांत सायंकाल सर्वप्रथम अपने घर के पूजा स्थान में, फिर सम्पूर्ण भवन सहित कार्यालय, व्यावसायिक स्थलों, अन्य मकानों और दुकानों में दीपदान (दीप प्रज्वलित) करना चाहिए।

उपहार और श्री महालक्ष्मी पूजन विधान (Deepawali Panch Maha Parva)

उपहारों का आदान-प्रदान: आज के दिन उपहारों का आदान-प्रदान अपने धन-ऐश्वर्य के अनुसार अपने से पूज्य देव, गुरु, ब्राह्मण, श्रेष्ठ तथा ज्येष्ठ-कनिष्ठ, धन से कमजोर व्यक्तियों, सहायकों, आश्रितों, ईष्ट मित्रों और समकक्षों को यथोचित उपहार, धन और द्रव्य देकर करना चाहिए। इससे दानदाता की कीर्ति और ख्याति में वृद्धि होती है और श्री महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। भारतीय संस्कृति का मूल यही है कि खुशियाँ बाँटने से ही खुशियाँ, संतोष से संतोष और धन से धन की प्राप्ति होती है। यदि आप संकीर्णता वश इसे संकुचित करेंगे तो उसका क्षेत्र और शक्ति कम होती जाएगी, जिससे जीवन पथ पर आप उन खुशियों से वंचित हो सकते हैं। अतः श्रेष्ठ और पूज्य व्यक्तियों को अपनी सेवा भेंट कर उनका आशीर्वाद अवश्य लें।

श्री महालक्ष्मी पूजन विधान: शास्त्रों में श्री महालक्ष्मी जी के पूजन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। अतः शुभ मुहूर्त में श्री महालक्ष्मी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। श्री महालक्ष्मी की पूजा प्रदोष काल में शुभ मानी गई है। यदि अमावस्या प्रदोष काल में न हो तो उससे पहले भी पूजा करने का विधान है।

दीपावली पंच महापर्व: श्री लक्ष्मी पूजन विधि और विशेष महत्व

श्री लक्ष्मी पूजन से संबंधित सभी पूजन पदार्थों को लेकर पवित्र आसन में बैठकर किसी ऐसे ब्राह्मण की सहायता से पूजा करें जो पूजापाठादि के नियमों से भलीभांति परिचित हो। षोडशोपचार विधि से पूजा करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। श्री सूक्त पाठ, पुरुष सूक्त और लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने या करवाने से माँ की महती कृपा प्राप्त होती है। अतः षोडशोपचार विधि से पूजा करते हुए ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर प्रणाम करना चाहिए। दीपावली की रात्रि में अपने आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के अंदर पूरी रात्रि अखंड दीप जलाना शुभ होता है। दीपावली पूजन को प्रदोषकाल से लेकर अर्द्धरात्रि तक किया जा सकता है। किंतु कुछ विद्वानों का मत है कि यदि अमावस्या प्रदोषकाल को स्पर्श न करे तो ऐसी स्थिति में दूसरे दिन पूजन करना फलप्रद होता है। किसी विशेष कार्य हेतु विशेष मुहूर्त का ध्यान देना सर्वथा लाभप्रद होता है।

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दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva): दीपावली पूजन का मुहूर्त

दीपावली का पर्व इस वर्ष 20 अक्टूबर 2025 को सोमवार, कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को सम्पूर्ण भारत सहित विश्व के देशों में भी मनाया जाएगा। रविवार के दिन दीपावली स्वाती/विशाखा नक्षत्र तथा प्रीति योग कालीन प्रदोष, निशीथकाल एवं अल्प समय के लिए महानिशीथ व्यापिनी अमावस्या युक्त होने से विशेष रूप से प्रशस्त एवं पुण्यफलदायक होगी।

लक्ष्मी पूजन मुहूर्त – दीपावली पर्व (Deepawali Festival)

लक्ष्मी पूजन मुहूर्त: 7:07 PM से 8:17 PM तक
अवधि: 01 Hrs 11 Min
प्रदोष काल: 05:45 PM से 08:17 PM Hrs तक
वृषभ काल: 07:07 PM से 09:02 तक

महानिशीथ काल और चौघड़िया मुहूर्त – दीपावली पर्व (Deepawali Festival)

महानिशीथ काल मुहूर्त:
महानिशीथ काल = 11:40 PM 20 अक्टूबर 2025 से 12:30 AM 21 अक्टूबर 2025 तक
सिंह काल = 21 अक्टूबर 2025 को 01:37 AM से 03:55 AM तक

इन शुभ मुहूर्तों में दीपावली पूजन करने से लक्ष्मी कृपा प्राप्त होती है और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva) का यह पर्व धन, सुख और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है।

माँ श्री महालक्ष्मी की कृपा हेतु आज के दिन साधकों, व्यापारियों, विद्यार्थियों तथा गृहस्थ का पालन करने वाले व्यक्ति को श्रीसूक्त, श्रीलक्ष्मीसूक्त, पुरूषसूक्त, राम रक्षास्तोत्र, हनुमानाष्टक, गोपालशस्त्रनाम आदि अनुष्ठान और जप करवाना चाहिए। जिससे उन्हें माँ लक्ष्मी की कृपा से वांछित फलों की प्राप्ति होती है। ध्यान रखें कि जप और अनुष्ठान प्रसन्नता, पवित्रता व श्रद्धा के साथ करना चाहिए। जप और अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मणों को श्रेष्ठ द्रव्य, धन, वस्त्राभूषण आदि की दक्षिणा श्रद्धा पूर्वक देनी चाहिए। इस पूजन-अर्चन व दान के समय भूलकर भी आलस्य, गुस्सा, प्रमाद, लोभ, अहंकार और कंजूसी न करें, जिससे फलप्राप्ति में रुकावटें न हों।

अन्नकूट गोवर्धन पूजन का फल – दीपावली पंचमहापर्व

पंचपर्व का यह चतुर्थ क्रम है जिसे अन्नकूट गोवर्धन कहा जाता है। भारत देश के पूर्वकाल में शैक्षिक व आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित होने का साक्ष्य वेद ग्रंथों में स्थान-स्थान पर मिलता रहता है। इसी का एक उदाहरण है गोवर्धन व अन्नकूट पूजा पर्व, जो कि दीपावली के ठीक दूसरे दिन आता है। हमारे यहाँ कहीं भी स्वार्थ में अंधे होकर प्रकृति से खिलवाड़ को समर्थन नहीं दिया गया, बल्कि उसका सहर्ष संरक्षण सदैव से किया जाता रहा है। जिससे यहां प्राकृतिक पूजा व उपासना को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जिसे स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण ने समर्थित किया तथा पृथ्वी पर बसने वाले मानव को यह समझाया कि पेड़, पौधे, नदियां, पर्वत, जल स्रोत व नाना विधि जीव जगत सब कुछ मुझसे उत्पन्न हैं। अतएव इनकी रक्षा करो, इनकी पूजा तुम्हें धन-धान्य से पूर्ण करेगी और तुम्हें आरोग्यता देगी। अतः इन्हें नष्ट करना धरा के अस्तित्व को खोने के समान है। अन्नकूट और गोवर्धन पूजा आदि इसी बात के गवाह हैं कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति के संरक्षण का अनूठा संगम है।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

समूचा हिंदुस्तान कार्तिक मास के शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और गो पूजा करता है। इस वर्ष 22 अक्टूबर 2025, दिन बुधवार को यह पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व में 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर जिसे अन्नकूट के नाम से जाना जाता है (जिसमें अन्न का अर्थ अन्न और कूट का अर्थ शिखर या पर्वत से है), विविध भांति निर्मित पकवानों को प्रभु श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और गोवर्धन नामक पर्वत की पूजा की जाती है, जो भारत के मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में स्थित है। आज के दिन दैत्यराज बलि की पूजा का भी विधान है।

पौराणिक कथा और श्रीकृष्ण की पूजा का महत्व – दीपावली पंचमहापर्व

इस संदर्भ में पौराणिक कथानक है कि पूर्व समय में लोग इंद्र देव की पूजा 56 प्रकार के भोगों से करते थे। परंतु द्वापर में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने लोगों को मथुरा नंदादि गांवों में अपनी लीलाओं से तृप्त किया। तब से प्रभु श्रीकृष्ण की पूजा का क्रम चल रहा है। इसी कारण लोग अन्नकूट गोवर्धन के दिन गोबर से बने हुए पर्वत आदि की पूजा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और सामूहिक रूप से विविध व्यंजनों का भंडारा भी करते हैं, जो समृद्धि का प्रतीक है।

भैया दूज या यम द्वितीया का महत्त्व – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

पंच महापर्व का यह पाँचवाँ और अत्यंत विशिष्ट पर्व भैया दूज या द्वितीया कहलाता है, जिसे कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक यह त्योहार अत्यंत विशेष होता है। इसका मुख्य उद्देश्य भाई और बहन के बीच स्नेह और निर्मलता को बढ़ाना है, इसी कारण इसे भैया दूज कहा जाता है। इस त्योहार के माध्यम से प्रत्येक बहन अपने प्रिय भाई की दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना करती है। साथ ही, उसकी समृद्धि और कीर्ति में निरंतर वृद्धि हो, यही प्रार्थना करती है। इस दिन बहनें अपने भाई को घर बुलाकर टीका करती हैं और नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन परोसती हैं। यदि भाई-बहन एक ही घर में रहते हैं तो भी बहन को आज के दिन अपने भाई को विविध पकवान खिलाना चाहिए।

भाई दूज का पर्व इस वर्ष 23 अक्टूबर 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा।

पौराणिक कथा और मान्यता – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

इस व्रत के संदर्भ में पौराणिक कथा है कि सूर्य पुत्र यम और पुत्री यमुना, जो भाई-बहन थे, बहुत दिनों बाद आज ही के दिन मिले थे। उनकी बहन यमुना ने यम जी को नाना प्रकार के पकवान आदरपूर्वक खिलाए थे। इससे प्रसन्न होकर भाई यम ने बहन को वर मांगने के लिए कहा। तब बहन यमुना ने वर मांगा कि “यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यह वर दें कि जो भी भाई इस दिन यमुना स्नान करके अपनी बहन के घर जाकर आदरपूर्वक मिलें, भोजन और मिष्ठान ग्रहण करें तथा अपनी क्षमता के अनुसार बहन को द्रव्य आदि भेंट दें, उन्हें अकाल मृत्यु का भय न हो और न ही उन्हें यमलोक की वेदनाएं भोगनी पड़ें।”

बहन के कल्याणकारी वचन सुनकर यम ने कहा – “ऐसा ही होगा।” तब से इस त्योहार का अत्यंत महत्व माना जाता है।

दीपावली पंचमहापर्व का समापन – दीपावली पंचमहापर्व (Deepawali Panch Maha Parva)

इन्हीं उपर्युक्त पाँच त्योहारों के साथ दीपावली पंचपर्व का यह उत्सव सम्पन्न हो जाता है।

दीपावली पंचमहापर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। माँ लक्ष्मी की आप पर सदैव कृपा बनी रहे।

शुभेच्छु – पंडित उमेश चन्द्र पन्त

5 दिन की दिवाली लक्ष्मी पूजा से हर दिन शुभता पाएं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें।

दीपावली पंचमहापर्व का महत्व – FAQs

प्रश्न: दीपावली पंचमहापर्व क्या है?
उत्तर: कार्तिक मास में मनाए जाने वाले पाँच त्योहार—धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज—को मिलाकर दीपावली पंचमहापर्व कहा जाता है।

प्रश्न: दीपावली क्यों मनाई जाती है?
उत्तर: अंधकार पर प्रकाश और असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक रूप में; यह श्रीराम के अयोध्या आगमन तथा माँ लक्ष्मी की कृपा-प्राप्ति का उत्सव है।

प्रश्न: धनतेरस और नरक चतुर्दशी का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: धनतेरस आरोग्य, समृद्धि और आयु-वृद्धि का संकल्प कराती है; नरक चतुर्दशी शारीरिक-मानसिक शुद्धि व नकारात्मकता से मुक्ति पर बल देती है।

प्रश्न: दीपावली के दिन प्रमुख पूजन क्या करें?
उत्तर: प्रदोष/निशीथ काल में श्री महालक्ष्मी-कुभेर पूजन, घर-कार्यस्थल पर दीपदान, स्वच्छता, दान और परिवार सहित आराधना।

प्रश्न: गोवर्धन पूजा और भैया दूज का महत्व क्या है?
उत्तर: गोवर्धन पूजा प्रकृति-संरक्षण व समृद्धि का प्रतीक है; भैया दूज भाई-बहन के स्नेह, दीर्घायु और कल्याण का उत्सव है।

यह भी पढ़ें: दीप पर्व दिवाली मे कैसे करे माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना 


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