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माँ ब्रह्मचारिणी – नवदुर्गा की दूसरी शक्ति

Published On : April 2, 2017  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

द्वितीय देवी ब्रह्मचारिणी की उत्पत्ति

भारत की पवित्र भूमि में सर्वत्र कल्याण हेतु देवी व देवताओं की परम शक्ति की अनुभूति प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। इस माया के प्रपंच में व्यक्ति नाना विधि जीवन में दुख, पीड़ाओं, दरिद्रता, रोग, भय, शत्रु से पीड़ित रहता है। अतः इन आएं हुए दुखों के निवारण हेतु माँ दुर्गा के रूपों की आराधना होती है। माँ जगदम्बा के दूसरे रूप को माँ ब्रह्मचारिणी के रूप से इस संसार में जाना जाता है। माँ की यह मूर्ति तेज बल, तप से युक्त है। अर्थात् माँ दुर्गा दूसरे दिन इस रूप में उत्पन्न होती हैं। ब्रह्मचारिणी ने अपने दिव्य तप के प्रभाव से राक्षसों को समूल नष्ट किया। अपने श्रद्धालु भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली तथा वरद हस्त रखे हुए हैं। ब्रह्मचारिणी माता के दाहिने हाथ में माला तथा बाये हाथ में कमण्डलु शोभा पा रहा है। यह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ सच्चिदानन्द से है, अर्थात् जो सच्चिदानन्दमय ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति करवा दे, यानी जिस देवी का स्वभाव परमब्रह्म की प्राप्ति करना हो वही ब्रह्म चारिणी हैं। इनकी आराधना से व्यक्ति के जीवन मे संयम, सदाचार, आत्मविश्वास, तेज, बल व सात्विक बुद्धि का विकास होता है। अविवेक, असंतोष, लोभ आदि का अंत होता। जीवन में उत्साह, धैर्य व साहस की वृद्धि होती है। व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति सजग होता है। अर्थात् जिससे जीवन सुखी, सुन्दर, सचेत, स्फूर्ति से युक्त हो जिनकी कृपा से स्त्री पुरूषों की बुद्धि निर्मल हो, भय, आलस्य, दम्भ, का अंत हो, वही देवी ब्रह्म चारिणी हैं। अर्थात् जीवन पथ को सुगम व व्यक्ति को पावन बनाकर उसका परम मंगल करने वाली, जीवन पथ पर पथ भ्रष्ट हुए लोगों के लिए तथा कठिन समय में धैर्य व साहस खोने वालों के लिए यह माँ की प्रतिमा दिव्य प्रकाश के समान है। अर्थात् वांछित लक्ष्य को भेदने तथा सफलता के कीर्तमान गढ़ने की ताकत देनी वाली यही माँ हैं।

ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान

माँ ब्रह्मचारिणी श्री माँ दुर्गा का द्वितीय रूप है, जिनकी पूजा अर्चना नवरात्रि के ठीक दूसरे दिन करने का विधान होता है। अतः ब्रह्मचारिणी माता की पूजा शास्त्रीय विधान के साथ करने का विधान है। सम्पूर्ण पूजा की वस्तुओं को एकत्रित करके शुचि अर्थात् स्नानादिक क्रियाओं को सम्पन्न करके शुद्धता पूर्वक किसी मन्दिर में माँ के समुन्मुख व अपने घर में ही गणेशादि देवी-देवताओं का पूजन करके माँ का ध्यान अर्चन पूजन करने का विधान होता है। माता की पूजा में षोड़षोपचार विधि का प्रयोग करना चाहिए। यदि आपका वैभव साथ दे रहा हो तो वैदिक ब्राह्मणों के द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ करवाना चाहिए। यदि आप अपने से पूजा कर रहे हैं, तो शुद्धता का ध्यान रखते हुए पूजन शुरू करके माँ को स्नानादि सहित धूप, दीप, सुगन्धित इत्र, सहित नैवेद्यादि अर्पण करके माता को प्रणाम करना चाहिए। और सम्पूर्ण पूजन को भक्ति भाव से माता को अर्पित कर देन चाहिए।

ब्रह्मचारिणी की कथा

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि ब्रह्मचारिणी माता का जन्म हिमालय राज पर्वत के यहाँ हुआ था। जिनकी माता का नाम मैना था। एक दिन की बात है। ऋषिवर श्रीनारद जी महाराज हिमालय के यहा घूमते-घूमते जा पहुंचे नारद के आगमन से उनका बड़ा ही भव्य स्वागत सत्कार महाराज हिमालय के द्वारा किया गया। सभी हाल चाल को जानने के बाद हिमालय राज ने कन्या के भी भविष्य के बारे में जानने की उत्सुकता प्रकट की। नारद जी द्वारा कन्या का हाथ देखकर हिमालय राज से उनके भावी जीवन का सम्पूर्ण हाल बताया गया। किन्तु वैवाहिक जीवन में अवरोध की स्थिति सुनकर उनकी माता अकुलाने लगी और नारद जी के जाने के बाद अपने पति से पूछती है, कि इस कन्या को कैसा पति मिलेगा उसकी स्थिति क्या होगी? मुनि ने क्या कहा है? आदि। तब सारी स्थिति को वह उनसे बताते हैं। कि मुनि श्री नारद जी ने कन्या के वैवाहिक जीवन की सुगमता व अन्य समस्याओं के निवारण हेतु व्रत, तप करने  के उपाय बताएं है। अर्थात् नारद जी के कहे हुए बचनों के अनुसार कन्या व्रत व तपस्या में लीन हुई और हजारों वर्ष तक कठिन तप किया, माँ ने 1000 वर्ष तक जंगल में उपलब्ध फलो को खाकर तथा 3000 हजार वर्ष तक कठिन तपस्या किया। जिसे गोस्वामी तुलसी दास श्रीराम चरित्र मानस में इस प्रकार वर्णित करते हैं- कछु दिन भोजन वारि बतासा। कीन्ह कछुक दिन कठिन उपवासा।। अर्थात् इस प्रकार की कठिन तपस्या व व्रत से देव समुदाय सहित साक्षात ब्रह्मा जी को प्रसन्न होकर जाना पड़ा। जिसमें ब्रह्मा जी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने का वरदान दिया जिससे इन्हें अन्नत अविनाशी भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए।

ब्रह्मचारिणी के मंत्र

माँ ब्रह्मचारिणी के आराध्य मंत्रों को अनेक स्थानों पर संबंधित ग्रंथों में दिया गया है। जिसमें सतत् कल्याण के विवध मंत्र समाहित है। जैसे संसारिक जीवन में रूप लावण्य, जय, यश को प्राप्त करने के लिए तथा काम व क्रोध के ताप से बचने के लिए माता के इस मंत्र को विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना करके स्मरण करना चाहिए।

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते  परमेश्वरि।  रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।  नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता स्मताम।। 

ब्रह्मचारिणी महात्म्य

माँ ब्रह्मचारिणी के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया गया है। माँ के तप बल से संसार के प्राणियों को तेज व बल, बुद्धि की प्राप्ति होती है।  यहाँ दुर्गा सप्तशती के कुछ अंश को महात्म्य के रूप मे वर्णित किया जा रहा है। देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हम लोग नियम पूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते है। रौद्रा को नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्री को को बारंबार नमस्कार है। शिवपत्नी माँ जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है। दुर्गम संकट से पार उतारने वाली, सबकी सार भूत सर्वकारिणी देवी को बारंबार प्रणाम है। ऋषि कहते है- राजन्! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहें थे, उस समय पार्वती देवी गंगाजी के जल में स्नान करन के लिये वहाँ आयी। उस सुन्दर भौंहों वाली भगवती ने देवताओं से पूछा- आप लोग यहाँ किसकी स्तुति करते है? तब उन्हीं के शरीर से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं- शुम्भ दैत्य से तिरस्कृत और युद्ध में निशुम्भ से पराजित हो यहां एकतित्र हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैं। पार्वती जी के शरीर से अम्बिका का प्रादुर्भाव हुआ था।, इसलिये व समस्त लोगों में कौशिकी कही जाती है। कौशिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती का शरीर काले रंग का हो गया, अतः वे हिमालय पर रहने वाली कालिका देवी के नाम से विख्यात हुई।

शुभ नवरात्री 

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