माँ कूष्माण्डा – नवदुर्गा की चौथी शक्ति

Date : April 2, 2017  | Author : Astrologer Umesh

चतुर्थ देवी कूष्माण्डा की उत्पत्ति

धरातल पर युगों से परम कल्याणकारी दैवी शक्ति की कृपा श्रद्धालु भक्तों को प्राप्त होती रही है। चाहे व सृष्टि के सृजन का क्रम हो या फिर जीवन को समृद्ध करने का क्रम हो या राक्षसी प्रवृत्ति को नष्ट करके देशकाल में धर्म व नीति सदाचार की स्थापना करना हो, बिना आदि शक्ति के कुछ भी सम्भव नही है। आज भले ही हम भौतिकता की चकाचैध में गुम होकर आत्म बोध से कोशों दूर रहते हुए ईश्वर व दैवीय शक्ति के स्मरण व पूजन से हटते जा रहे हो, किन्तु देवीय शक्ति तो प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण ही करती है। माँ आदि शक्ति दुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्माण्डा के नाम से इस संसार में सुविख्यात है। यह सम्पूर्ण जगत की जननी हैं। इतना ही नहीं यह दिव्य प्रकाश पुंज की मूर्ति हैं, जो अपने दिव्य ज्योति से संसार को न केवल प्रकाशित कर रही है। बल्कि सूर्य जैसे महाताप से युक्त ग्रह के, अर्थात् सूर्य मण्डल में निवास करने की अद्वितीय शक्ति से युक्त हैं। अर्थात् यह सृष्टि की सृजन कर्ता आदि शक्ति हैं। जिनके संदर्भ में कहा जाता है, कि यह त्रिविध ताप से युक्त संसार को अपने उदर में समाहित किए हुए, ऐसी माँ जगत् जननी आदि शक्ति कहलाती हैं। यह विश्व के समस्त प्राणियों पर दया करने वाली हैं। अर्थात् माँ दुर्गा की इस प्रतिमा की उत्पत्ति चतुर्थ नवरात्रि में होती है। जो दिव्य रूप के साथ अष्टभुजाओं से युक्त है और जगत कल्याण के लिए अपने दाहिने हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प से शुशोभित हो रहे है। माता के बाएं हांथों में अमृतपूर्ण कलश, माला, गदा, चक्र को लोक हितार्थ धारण कर रखा है। यह सिंहारूढ़ है, तथा अपने दिव्य तेज से दिशाओं व विदिशाओं को प्रकाशित कर रही हैं। सभी चल, अचल सजीवों में जो भी प्रकाश व आभा है, वह इनके प्रकाश से ही हैं। माँ की कृपा से भक्तों के रोग, दुःख, भय, चिंताएं दूर होती है तथा प्रत्यक्ष व परोक्ष शत्रु भी कुछ नही बिगाड़ सकते हैं।

कूष्माण्डा की पूजा का विधान

श्री माँ दुर्गा के इस चतुर्थ प्रतिमा का नाम कूष्माण्डा है। जिनकी पूजा आराधना नवरात्रि के चतुर्थ दिन में होती है। अतः श्रद्धालु भक्तों को माँ की पूजा शास्त्रीय विधि को अपनाते हुए, तन व मन की निर्मलता का ध्यान रखते हुए करना चाहिए। श्रीगणेशादि देवी-देवताओं का पूजन अर्चन यथा विधि द्वारा पहले करते हुए षोड़षोपचार विधि से माता की अर्चना करने का विधान होता है। पूजन की सम्पूर्ण सामाग्री को संग्रहित करके माँ की पूजा अर्चना करते हुए उन्हें प्रणाम करके क्षमा प्रार्थना तथा पूजा का समर्पण करना चाहिए। जिससे माँ की कृपा से भक्तों को इच्छित फलों की प्राप्ति होती है।

माँ कूष्माण्डा की कथा

माँ कूष्माण्डा सृष्टि के सृजन हेतु चतुर्थ रूप में प्रकट हुई, जिनके उदर में सम्पूर्ण संसार समाहित है। आदि काल मे घने अंधकार से घिरे हुए संसार में प्रकाश का आभाव होने से संसारिक व जैविक हलचल ठप्प सी हो गई थी। किन्तु माँ की प्रतिमा ऐसे प्रतिभासित हो रही थी कि जैसे अनेको सूर्य चमक रहे हो। माँ के चेहरे के दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकाश व रोशिनी का प्रादुर्भाव हुआ। जैसे किसी किसी पुष्प में अंडे का निर्माण होता है। वैसे ही देवी की कुसुम के समान हंसी मात्र से यह संसार हंसने लगा, अर्थात् इस संसार का जन्म हुआ। जिसके कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। सब देशों में समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली देवी अपने उत्पन्न किए हुए जगत के जीवों के शुभाशुभ कर्मो को विशेष रूप से देखती हैं और उनके अनुरूप फल की व्यवस्था करने के लिए समस्त विभूतियों को धारण करती है। इतना ही नहीं, यह ज्ञानमयी ज्योति से जीवों के अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर देती है। जिससे अविद्यामय अंधकार स्वतः नष्ट हो जाता है। इन माँ रूप बड़ा ही दिव्य है। जो संसार की माता ही नहीं, बल्कि ज्ञान, धन, बुद्धि, प्रकाश, बल की दाता परम कल्याणी देवी हैं।

नोटः यह कथानक दुर्गासप्तशती से वर्णित है।

कूष्माण्डा के मंत्र

माँ कूष्माण्डा के विविध मंत्रों को कई संदर्भों में प्राप्त किया जा सकता है। माँ की स्तुति के अनेक मंत्र दुर्गा सप्तशती के मानक ग्रंथ में है। माँ की कृपा प्रसाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं को निम्न मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए। जिससे उन्हें माँ की कृपा से इच्छित फलों का लाभ होता है और उनका जीवन धन्य हो जाता है। यहाँ माँ कूष्माण्डा के आराधना के मंत्रों को दिया जा रहा है।

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्  । त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।।

 कूष्माण्डा महात्म्य

माँ कूष्माण्डा के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया गया है। माँ की छवि बड़ी ही दिव्य है। यह सृष्टि की चक्षु के रूप में है। इन्हीं की कृपा से सम्पूर्ण सृष्टि को तेज, कांति व नेत्र दृष्टि सहित ज्ञान की प्राप्त हुई है। इनका यह रूप परम तेजस्वी है। अतः इनकी पूजा उपासना का बड़ा ही महत्व है। बिना इनकी कृपा व्यक्ति न संसार में आंखों की ज्योति को प्राप्त कर सकता है। ना ही जीवन में कभी भी दूरदर्शिता को प्राप्त कर सकता है। अतः इन माता की पूजा चतुर्थ नवरात्रि में भक्ति भाव से करने का बड़ा महात्म्य है। अतः प्रेमी व श्रद्धालु भक्त जनों को वांछित फलों हेतु माँ की अर्चना भाव पूर्ण ढंग से करना चाहिए। यह ऐसी देवी है जिनके उदर में संसार पल रहा। इनके हंसने मुस्कुराने मात्र से सृष्टि में दिव्य तेज, प्रकाश व जीवन का संचार होता है। यह माँ भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली तो है, ही साथ ही श्रद्धालु भक्तों के कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहती है।

शुभ नवरात्री 

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