हिन्दी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत एवं पर्व

यह पर्व ईश्वर की सत्ता एवं धर्म की नींव को पुष्ट करने वाला अत्यंत पवित्र एवं सत्य के प्रति जीवन को प्रेरित करने वाला महान धार्मिक पथ है। जो अधर्म एवं अहंकार को चकना चूर करके। धरती पर बढ़ते हुये पापियों के नाश एवं साधु जनों और मानव के कल्याण का प्रेरक है। यह भक्ति स्तम्भों को और सुदृढ़ करने वाला परम हितकारी है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धरती पर बढ़ते हुये पापाचार को समाप्त करने तथा अधर्म को हटाकर धर्म की स्थापना हेतु हुआ था। भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत बड़े हर्षोल्लास के साथ इस धर्म प्राण भारत भूमि में मनाया जाता है। यह पर्व भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में जहाँ भी भगवान श्रीकृष्ण को मानने वाले हिन्दू या फिर अन्य भक्त लोग है। इसे प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाते है। तथा इस दिन स्त्री एव पुरूष व्रत का संकल्प लेकर उपवास करते हैं। तथा भगवान के मन्दिर को बहुत ही आकर्षक रूप से सजाते हैं। तथा उनके लीलाओं एवं भजनों का श्रवण एवं स्थान-स्थान पर धार्मिक कथायें होती है। इस दिन भगवान का जन्म रात्रि के 12 बजे हुआ था इसलिये सभी कृष्ण मन्दिरों एवं अन्य मन्दिरों में रात्रि 12 बजे तक सभी भक्त जागरण करते हैं। साथ ही अपने घरों में भगवान की प्रतिमा को बहुत की आकर्षक रूप से सजाकर उनकी पूजा अर्चना करते एवं करवाते हैं। उनकी भक्ति में रंगे अनेक भक्त तरह-तरह के पकवान एवं मिष्ठान तथा फलादि उन्हें अर्पित करते हैं। तथा बड़ी ही आकर्षक झाँकियों के दिव्य दर्शन होते हैं। छोटे-छोटे बाल गोपाल बड़े दिव्य एवं उनकी सूरत मनमोहक होती है। इस अवसर पर छोटे बालक एवं बालिकायें श्री राधा एवं कृष्ण के हूबहू रूप से सजते एवं संवरते हैं। तथा ऐसा प्रतीत होता है, मानों श्रीकृष्ण साक्षात् अकार अपनी मनोहारी छटा को बिखेर रहे हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ईश्वर भक्ति का एक बड़ा ही उत्कृष्ट अवसर है। क्योंकि ब्रह्मपुराण का मत है कि द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। इस व्रतोत्सव करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

श्रीकृष्ण जन्म के अद्भुत रहस्य

परम अवतार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बड़ा ही अदभुत एवं रहस्यपूर्ण है। क्योंकि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णू के अवतारों में श्रीकृष्ण भगवान का अवतार परम कल्याणप्रद एवं धर्म का रक्षक है। जिससे वह महान तपी एवं व्रती पिता वासुदेव एवं माता देवकी के यहाँ जन्म लेते हैं। भक्तों के तप एवं व्रत को सफल बनाने के लिये उनके मांगे हुये वरदान को सफल बनाने हेतु उन्हें वात्सल्य के सुख से आनन्दित करते हैं। संसार को बंधनों में बांधने वाले भगवान खुद ही मर्यादा के बंधनों में बंधकर उनका पालन करते है। तथा अपने बचपन की बाल लीलाओं से सभी को विस्मृत कर देते हैं। उनके अनेक ऐसे रहस्य एवं कथायें हैं जो सभी को आश्चर्य चकित कर देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की अनेक कथायें है। किन्तु सबसे प्रमुख मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र पापी कंस के अत्याचार एवं अन्य राक्षसों एवं पापियों की वजह से जब पृथ्वी अकुला उठी और सज्जन एवं साधू लोग त्राहिमाम करने लगे तो द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने माँ देवकी के गर्भ से जन्म लिया।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत वैष्णव एवं स्मार्त का महत्व

श्रीकृष्ण जन्माष्टी का व्रत सभी लोग रखते हैं। किन्तु इसमें वैष्णव एवं स्मार्त सम्प्रदाय के लोग भगवान का व्रत करते है। जिसमें किस सम्प्रदाय के लोगों को कब और किस तिथि में व्रत करना है। इसका निर्णय पंचांग में दिया जाता है। स्मार्त लोग वह होते हैं (सामान्य गृहस्थी) जो सप्तमी से ही व्रत करते हैं किन्तु अष्टमी तिथि कभी-कभी मध्य दिन या मध्य रात्रि से आती है, वैष्णव लोग (साधू संयासी एवं अन्य लोग जो कि गृहस्थ से हटकर त्यागी है) जो अष्टमी व्यापनी तिथि में व्रत को प्रारम्भ करते हैं वह अर्ध रात्रि रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत एवं जन्मोत्सव मनाते हैं। स्मार्त सम्प्रदाय सप्तमी युक्त अष्टमी को मानते हैं। किन्तु वैष्णव सम्प्रदाय वाले सूर्यादय से ही अष्टमी युक्त तिथि को मानते हैं। इसी प्रकार हमारे सरकारी अवकाश और श्रीकृष्ण की पावन जन्म भूमि मथुरा आदि मंदिरों मे उदय कालिक तिथि यानी अष्टमी का ही अनुसरण करते हुये व्रतोत्सव करते हैं, जो वैष्णव सम्प्रदाय से मिलता है। यानी वैष्णव सम्प्रदाय के लोग अपनी तिथि में और स्मार्त वाले अपनी तिथि में व्रत करते हैं। जिससे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी में इसका महत्व और बढ़ जाता है। क्योंकि सभी सम्प्रदाय के लोगों को अपने ही तिथि में व्रत का विशेष धार्मिक लाभ एवं पुण्यफल प्राप्त होता है। इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व स्मार्त और वैष्णव भेद से 11,12 अगस्त 2020 दिन मंगलवार एवं बुधवार को भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष तिथि अष्टमी को अति हर्षोल्लास के साथ सम्पूर्ण भारत एवं विश्व में मनाया जाएगा।

श्रीकृष्ण जन्म हेतु हुई आकाश वाणी

हमारे धार्मिक ग्रन्थों में कथानक प्राप्त होता है। कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पूर्व द्वापर युग में बड़े ही आश्यर्चमय ढंग से आकाशवाणी हुई थी कि हे! कंस जिस चचेरी बहन को तू इतना लाड़-प्यार के साथ ससुराल भेज रहा है। उसका आठवां पुत्र तेरा काल होगा। और वह तुझे मारकर धरती से तेरे पापों का अंत करेगा। और धर्म की स्थापना करेगा। ऐसी आकाशवाणी को सुनकर कंस घबड़ा गया और सोचा क्यों न मै अपनी बहन को ही मौत के घाट उतार दूँ। ऐसा सोचकर जैसे ही उसने अपनी चचेरी बहन को मारने के लिये म्यान से तलवार खींचा तो उसके पति वासुदेव ने उसे रोक लिया और कहा कि हे! कंस इसे मत मारों यह निर्दोष हैं इसके आठवें पुत्र से तुम्हें भय है तो इसके जो भी पुत्र होगे मैं तुम्हें देता जाऊॅगा। इस बात को सुनकर कंस खुश हुआ और देवकी को जीवन दान दिया किन्तु घबड़ाये हुये कंस ने दोनों को कारागार में डलवा दिया दिया और जैसे ही देवकी को कोई संतान होती तो उसे लेकर मौत के घाट उतार देता था। इस प्रकार एक समय ऐसा आया जिस हेतू आकाशवाणी हुई थी, कि श्री हरि विष्णू जगत के नियन्ता अपने अंशिक रूप को नरतन मे प्रकट किया। उस समय पापी कंस की सारी सुरक्षा व्यवस्था धरी की धरी रह गयी। वह परम पुनीत एवं बेहद शुभ घड़ी कृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि 12 बजे की थी। जब भगवान का जन्म हुआ तो चारों ओर फैले घनघोर अंधेरे के बीच बड़ा ही अद्भुत प्रकाश फैल गया तथा तथा उनके माता-पिता की बेड़िया अपने आप ही खुल गयी। और श्री हरि के दर्शन को उत्सुक नंद एवं नन्दरानी तथा समस्त गोकुल गांव जहाँ पिता वसुदेव ने जन्म के समय ही उन्हें पहुंचा दिया और बदले में नन्दरानी की कन्या को उठा लायें। उस भाद्रपद के महीने की काली रात्रि जो अति भयानक प्रतीत हो रही थी। तब पिता वासुदेव ने भगवान श्रीकृष्ण को सुरक्षित कर दिया और दैवयोग से कारागार की स्थिति ठीक पहले जैसे हो गयी। तो सभी पहरेदार जाग उठे और कन्या के रोने की आवाज को सुना तथा कंस को जानकारी दी इतने में अपनी मृत्यु से भयभीत कंस उस कन्या को देवकी के लाख मना करने के बाद भी नहीं माना और जैसे ही मारने के लिये ऊपर उठाया तो वह परम शक्ति योगमाया आकाश मार्ग में ही उड़ गयी और जोरदार ठहाका लगाकर कहा कि अरे! मूर्ख! कंस, तेरा काल पैदा हो चुका है। जिससे कंस और सहम गया तथा भगवान को मारने के लिये कई राक्षसों को भेजा किन्तु परम ईश्वरीय शक्ति उनका संहार खेल-खेल ही में करती रही है। तथा श्रीकृष्ण अपनी अनेक बाल लीलाओं के द्वारा सभी के मन को प्रमुदित कर देते थे।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं मथुरा

यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का महान पर्व है। इस अवसर पर देश एवं विदेश से योगेश्वर कृष्ण के दर्शन के लिये श्रद्धालु भगवान की जन्मस्थली मथुरा पहुंचते हैं। भगवान की लीलायें एवं श्रीमद् भगवदगीता के उपदेश युगों से बड़ा ही उत्कृष्ट जीवन दर्शन लोगों के लिये पेश कर रहे हैं। इस अवसर पर मथुरा में विशेष एवं मुख्य पर्व का आयोजन होता है। जहाँ की साज-सज्जा अति आकर्षक एवं लुभावनी होती है। तथा विशाल जन समूह इस अवसर पर वहाँ पहुंचकर इस पर्व को मनाते हैं। मंन्दिरों एवं भगवान की झाँकियों को विशेष सजाकर उन्हें आकर्षक बनाया जाता है। इस पर्व पर मथुरा से लेकर सम्पूर्ण भारत कृष्णमय हो जाता है। भगवान की रास लीलायें एवं कथाओं का बड़ा ही मनोरम दृश्य होता है। तथा भगवान को पालने में बैठाकर झूला झुलाया जाता है। भगवान के झूले को सभी भक्तों के दर्शन हेतु एवं झुलाने के लिये मंदिर प्रांगण मे रखा जाता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का फल

इस पर्व में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत महान कल्याणकारी होता है। इस व्रत को विधि विधान पूर्वक करने से शरीर के कई तरह के रोग, व्याधि एवं पीड़ाओं का अंत होता है। तथा दुख एवं शोक समाप्त होने लगते हैं। तथा श्रद्धालु भक्तों को सुख सौभाग्य का लाभ प्राप्त होता है। तथा भगवान की भक्ति एवं पुण्य उत्पन्न होने से जीवन धन्य हो जाता है। तथा अंत में भक्त सद्गति एवं मोक्ष के अधिकारी हो जाते है। यह जन्माष्टमी का व्रत बड़ा ही पुण्यकारी होता है। इस व्रत के पालन करने के व्यक्ति को स्थिर लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। किन्तु जो इस व्रत का पालन जानबूझ कर नहीं करते हैं। उनके संदर्भ में पुराणों में इस प्रकार कहा गया है। जैसे स्कन्द पुराण के अनुसार कृष्णजन्माष्टमी का व्रत नहीं करता उसे सर्प एवं बाघ योनि में जन्म लेकर वन में भटकना पड़ता है। इसी प्रकार भविष्य पुराण का कथन है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत जो व्यक्ति नहीं करता उसे कई प्रकार के दुःखों की प्राप्ति होती है। तथा अगले में जन्म में राक्षस बनकर उत्पन्न होता है। अतः श्रद्धा विश्वास पूर्वक इस पर्व में व्रतोत्सव करें जो अति पुण्यकारी है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि

जन्माष्टमी के व्रत की पूर्व संध्या में ही नियम एवं संयम का पालन करें तथा मदिरा आदि तामसिक आहारों से दूर रहें। तथा प्रातः काल ब्रह्म मुहुर्त में उठकर शौचादि क्रियाओं से शुद्ध होकर नये या फिर धुले हुये साफ- सुथरे वस्त्राभूषणों को धारण करें। तथा शुद्ध आसन में बैठकर भगवान का स्मरण करें। और अपने ऊपर पवित्री मंत्र बोलते हुये जल छिड़क ले और फिर योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें कि हे! प्रुभ आप अन्तरयामी और जगत के दाता है। मुझे आपके इस व्रतोत्सव के पालन की शक्ति एवं आपकी भक्ति प्राप्त हो आप मेरा सर्व विधि कल्याण करें। इस प्रकार अपने व्रत का संकल्प लें। या फिर किसी ब्राह्मण एवं कर्मकाण्ड के पुरोहितों से इसका संकल्प करायें। तथा श्रीकृष्ण की प्रिय पूजन सामाग्री को एकात्रित करके विविधि प्रकार के मेवे मिष्ठान, माखन एवं मिश्री तथा पुष्प एवं फलादि को एकत्रित करके उनका विधि विधान के साथ षोड़शोपचार विधि से पूजन करें या फिर करवायें। जब तक भगवान श्रीकृष्ण का जन्म नहीं हो जाता तब तक यानी रात्रि 12 बजे तक उनके जन्म के समय तक भक्ति भाव पूर्वक जागरण करते रहे और उत्सव को मनायें। इस व्रत के पुण्य प्रताप के कारण इसे व्रतराज भी कहा जाता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

इस पर्व का धार्मिक, सामाजिक, न्यायिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर जहाँ बड़ा महत्व है। वहीं प्रत्येक स्तर पर यह हमारे लिये बहुत ही खास तथा शिक्षाप्रद बना हुआ है। यह हमारे लिये परस्पर भाईचारे एवं सद्भाव का त्यौहार है। श्रीकृष्ण एवं राधे कृष्ण का नाम जपने से एवं रात्रि उत्साह पूर्वक जागरण करने से व्यक्ति में ज्ञान का संचार होता है। इससे अनावश्यक रूप से संसार की आशक्ति से छुटकारा प्राप्त होता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शिक्षा एवं संदेश

यह त्यौहार परस्पर भाईचारे एवं सद्भाव का त्यौहार है। यह त्यौहार आपस में मिलजुल कर चलने और न्याय धर्म को अपनाने तथा सत्य पर अड़िग रहने का संदेश देता है। और मानव जीवन में यह संदेश देता है कि पाप और अधर्म तथा अत्याचार करने वाले चाहे कितने भी साधन सम्पन्न एवं विशाल शक्तिशाली हो जाये पर न्याय एवं सत्य तथा धर्म की धुरी जैसे ही घूमती है। वैसे ही अधर्म एवं अत्याचार का समूल नाश ठीक उसी प्रकार होता जाता है। जैसे प्रकाश की एक किरण पड़ने मात्र से समूचे अंधकार का विनाश हो जाता है। श्रीकृष्णाष्टमी के दूसरे दिन भाद्र माह की कृष्ण नवमी को नंदोत्सव की बड़ी ही धूम होती है। इस असवर पर भगवान का चरणोदक पान किया जाता है तथा उसे सम्पूर्ण शरीर में छिड़का भी जाता है। तथा इस अवसर पर नाना प्रकार के सुरीले वाद्य यंत्र भी सुनाई देते हैं। जगत् के गुरू भगवान श्रीकृष्ण लोगों के सभी प्रकार के अंधकार को दूर करने का बड़ा ही सुगम एवं सद्भावपूर्ण संदेश देते हैं। जिससे आज भी सम्पूर्ण जगत् अपने कल्याण की आश लगाये हुये है। यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित अनेक भक्ति भाव पूर्ण साहित्य एवं शिक्षा प्रद कहानियां युगों से लिखी जा रही हैं। प्रत्येक काल में इनके बड़े ही पहुंचे हुये भक्तों की एक लंबी श्रृखंला मिल रही है। भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से युक्त हैं। चाहें उनकी मुरली की मधुर तान हो या फिर दुष्टों के संहार की कला तथा युद्ध कौशल आदि हो वह राजनीति, परिवार, नृत्य, संगीत आदि कलाओं में सर्वोपरि बने हुये हैं। ऐसे ही समाज के स्वच्छ प्रतिबिम्ब को दूषित करने वाले तथा अधर्म का आचरण करने वाले पापी शिशुपाल, कंस दुर्योधन एवं शकुनि जैसे दुष्टों का संहार करके धर्म स्थापना की शिक्षा संसार को देते हैं। तथा भोग वासनाओं को ही सर्वोपरि मानने वाले संसार के जीवों के उद्धार का बड़ा ही स्पष्ट संदेश देते हैं। क्योंकि जीव अपने कर्म भोग से उत्पन्न होता है और उसे भोगने के लिये उसे जन्म लेना पड़ता है। किन्तु भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण किसी कर्म व माया के वश मे नहीं है। बल्कि सम्पूर्ण कर्म एवं माया उन्हीं के वश में है। जैसे एक नाटक करने वाला जिस भी अंश को प्रस्तुत करता है उसी के अनुरूप नियमों मे बंध कर उन्हें पेश करता है। इसी प्रकार भगवान जगत के गुरू एवं पालन हार तथा उद्धार कर्ता हैं। उन्हें कोई माया व्याप्त नहीं करती है। वह तो नटवर ही हैं। क्योंक वह संसार में सभी के भक्ति एवं पे्रम को समझते हैं। चाहे वह गोपियों का प्रेम हो और उनकी उलाहना हो या फिर महाराज विदुर के घर पहुंचकर केले के छिलके खाने की बात हो या फिर पूतना द्वारा उन्हें स्तनपान कराने की बात हो सभी बड़ी ही रोचक एवं समाज के लिये शिक्षाप्रद कथायें हैं। भगवान माँ यशोदा एवं नन्द के यहाँ जाकर अपने आनन्द को विस्तारित करते हैं। जिससे उन्हें आनन्द कद कहा जाने लगा। अर्थात् यह व्रतोत्सव हमारे लिये अत्याधिक शिक्षाप्रद है।

यह भी पढ़ें: देवशयनी एकादशी और निर्जला एकादशी