हिन्दी

अनंग त्रयोदशी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

अनंग त्रयोदशी व्रत का महात्म्य

यह व्रत हिन्दू धर्म में पुनः जीवन के संचार को जोड़ने वाला है। जिसके संदर्भ में धार्मिक ग्रन्थों में कई सारगर्भित कथायें प्राप्त होती हैं। अनंग का अर्थ होता है। बिना अंग वाला अर्थात् जिससे कोई शरीर नही हो वह अनंग कहलाता है। यह व्रत मधुमास यानी चैत्र मास की शुक्ल पक्ष तिथि में बडे ही हर्षोल्लास के साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है। अनंग त्रयोदशी व्रत को भगवान शिव एवं आदि शक्ति माँ भगवती पार्वती से जुड़ा हुआ माना जाता है। साथ ही इस व्रत के जनक भगवान कामदेव एवं उनकी पत्नी रति जिसके द्वारा यह भूतल सृजित है। की कृपा प्रसाद पाने के लिये किया जाता है। हालांकि स्थान एवं मतान्तर भेद होने से इसे कहीं-कहीं चैत्र मास के अलावा मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। जिससे इस त्रयोदशी के व्रत का और भी महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इसी तिथि में अधिकांशतः प्रदोष व्रत का संयोग जुड़ा हुआ होता है। जिससे यह सोने में सुहागा की तरह हो जाती है। क्योंकि भगवान शिव महादेव एवं भोले बाबा के रूप में प्रतिष्ठित हैं। जो प्रदोष एवं त्रयोदशी के व्रत का पालन करने वाले सभी भक्तों को वांछित फलों को देने वाले होते हैं। जिससे दुःख दारिद्र समाप्त होते है। इस अनंग त्रयोदशी के व्रत के पालन से अनेक कष्टो से छुटकारा मिलता है। तथा वैवाहिक जीवन और सुखद हो उठता है। तथा पति एवं पत्नी की कलह को विराम मिलता है। और निः संतान दम्पत्ति संतान सुख की अनुभूति इस व्रत के पुण्य प्रभाव से प्राप्त होती है। अतः श्रद्धालुओं को विश्वास एवं आस्था के साथ इस व्रत का पालन करना चाहिये। जिससे तन एवं मन के कष्टों से छुटकारा प्राप्त होता है।

अनंग त्रयोदशी व्रत की पूजा विधि

इस व्रत का पालन बड़े ही नियम एवं संयम के साथ करना चाहिये। क्योंकि इस व्रत में शुद्धता एवं ब्रह्मचर्य के पालन का जहाँ महत्व दिया गया है। वहीं श्रद्धा विश्वास एवं भक्ति भावों का भी समावेश इस व्रत में बहुत ही खूब तरीके से किया गया है। तथा व्रत एवं पूजन की सभी सामाग्री को संग्रहित कर लें। जिसमें शिव और पार्वती का ध्यान रख तथा कामदेव एवं रति का ध्यान देते हुये उनसे संबंधित सुगन्धित एवं सफेद पुष्प तथा विल्वपत्र, भांग, बेर, ऋतु फल और कई मीठे फल एवं मिष्ठान तथा सौंदर्यं को बढ़ाने वाली वस्तुयें तथा आकर्षक वस्त्र आदि जो श्रृंगार एवं रति को बढ़ाने वाले हो उन्हें एकत्रित करें। और आसन में बैठकर आचमन एवं शुद्धि क्रिया को करते हुये विधि विधान से उनका पूजन अर्चन करें। या फिर कर्मकाण्ड में निपुण ब्रह्मण से पूजन अर्चन करवायें और अपने पूजन को भगवान शिव को अर्पित कर दें। यथा शक्ति ब्रह्मणों को दान दक्षिणा दें।

अनंग त्रयोदशी व्रत कथा

इस संदर्भ में प्रमुख रूप से तारकासुर और देवताओं की कथा प्रचलित है। एक समय की बात है जब वरदान की शक्तियों के बल पर तारकासुर नामक राक्षस देव आदि लोगों में अत्याचार एवं क्रूरता को बढ़ा दिया जिससे चहुओर हाहाकार सा मच गया। जिससे देव समूहो नें परम पिता ब्रह्म जी से इसका निदान पूछा तो पितामह ने देवताओं को बताया कि इसका निदान शिव के पुत्र कर सकते है। किन्तु शिव ध्यान लगाकर बैठे हैं। इससे किसी कि हिम्मत उनके पास जाने की नहीं हो रही थी जिससे काम देव एवं रति को इस काम के लिये नियुक्त किया गया। क्रोध में आकर शिव ने उन्हें भस्म कर दिया किन्तु जब पूरा माजरा पता चला तो भोले नाथ ने कामदेव को जीवित कर उन्हें अनंग कर दिया तब यह कथा अनंग त्रयोदशी के रूप में प्रचलित है।

यह भी पढ़ें: महाशिवरात्रि पर्व और हनुमान जयंती