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श्री गणेश चतुर्थी व्रत

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

श्री गणेश चतुर्थी व्रत एवं उसका महत्व

यह व्रत भगवान श्री गणेश जी को प्रसन्न रखने तथा वांछित कामनाओं के सिद्धि करने के उद्देश्य से किया जाता है। चतुर्थी तिथि गणपति भगवान को बहुत ही प्रिय है। जिस कारण वह इस व्रत के व्रती को सुख-समृद्धि एवं धन वैभव को देते हैं। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के संकट व कष्टों का निवारण होता है। चाहे वह किसी श्राप के द्वारा उसे होने वाली परेशानी हो या फिर कोई अन्य संकट व कष्ट हो तो उसका निवारण इस व्रत के प्रभाव हो जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि दो बार आती है। किन्तु माह एवं वार के अनुसार इस चतुर्थी तिथि का महत्व अलग-अलग होता है। क्योंकि भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने के अनेकों व्रत एवं कथानक प्राप्त होते हैं। चतुर्थी तिथि कष्टों को दूर करने और कई दुःखों का नाश करने के कारण प्रत्येक माह की चतुर्थी का अपना महत्व एवं व्रत का असर होता है। हर महीने की कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को श्री गणेश चतुर्थी या फिर संकट चौथ के नाम से जाता है। श्रावण, भाद्रपद, मीर्गशीर्ष एवं माघ के महीनों की चतुर्थी का अपना विशेष महत्व है।जिस कारण इसे संकट गणेश चतुर्थी कहा जाता है। यानी संकट कैसा भीहो उसके शमन के कारण ही इसे संकट गणेश चतुर्थी कहते है। इस व्रत में भगवान गणेश सहित भगवती पार्वती एवं भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। भगवान श्री गणेश को मोदक एवं दुर्वा अत्यंत प्रिय होता है। अतः इस तिथि में अवश्यक ही इन्हें मोदक अर्पित करना चाहिये। हमारे धार्मिक एवं प्रत्येक वैदिक कार्य में गणपित की प्रथम पूजा अत्यंत उपयोगी है। वहीं किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत भी गणेश पूजा से ही होती है। अतः चतुर्थी तिथि का अपना विशेष महत्व होता है।

गणेश चतुर्थी व्रत एवं पूजा विधि

भगवान श्री गणेश की पूजा हेतु समस्त प्रकार की शुद्धता का ध्यान देते हुये इनके व्रत का विधान करना चाहिये। व्रत के एक दिन पहले ही कुछ प्रमुख तैयारियों को कर लेना चाहिये और नियम एंव संयम का ध्यान देना चाहिये। तथा सभी प्रकार के तामसिक आहारों का त्याग कर देना चाहिये। जैसे लहसुन प्याज तथा मांस, मछली शराब आदि तथा व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले उठकर अपने समस्त शौचादिक एवं स्नान की क्रियाओं को करें। तथा पूजन संबंधी जो भी सामाग्रीहो, उन्हें संग्रहित करके पूजा स्थल में अपनी आर्थिक शक्ति के अनुसार उनकी मूर्ति को धातु जैसे सोने, चांदी तथा मिट्टी काष्ट पत्थर की मूर्ति को स्थापित करें। तथा उपकी पूजा प्रतिष्ठा विधि पूर्वक करें। ध्यान रहे हैं गणपित जहाँ प्रथम पूज्य है। वहीं पंचदेव की श्रृंखला में प्रधान देवता भी है। अतः षोड़शोपचार विधि से उनकी पूजा अर्चना करें। तथा अपनी सम्पूर्णपूजा एवं प्रार्थना कर्म को भगवान गणेश को भक्ति पूर्वक अर्पित कर दें। तथा श्रद्धा विश्वास पूर्वक अपने वांछित को उनके सामने प्रकट करें। क्योंकि इनकी कृपा से बड़े से बड़े कष्टों से छुटकारा प्राप्त होता है। ध्यान रहे व्रत एवं पूजा के समय किसी प्रकार का कोई गुस्सा न करे।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

गणेश चतुर्थी व्रत के संबंध में धर्म शास्त्रों में अनेकों कथाओं का वर्णन है। जिसमें एक प्रचलित कथा को संक्षिप्त रूप में वर्णित कर रहें हैं। प्राचीन समय में भगवान शिव एवं भगवती पार्वती की इच्छा आपस में पांसे खेलने की हुई। किन्तु हार जीत के निर्णय हेतु माँ पार्वती ने घास आदि तृण को एकत्रित कर उसे प्रतिष्ठत किया और उसमें मंत्र शक्ति के द्वारा प्राणों को प्रतिष्ठत कर दिया है। तथा उसे निर्देशित किया कि बेटा हम पांसे खेलने जा रहे है। अतः हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता इसका निर्णय आपको करना होगा। इस प्रकार माँ भवानी एवं आदिदेवमहादेव के मध्य खेल शुरू हुआ। और दैवयोग से पार्वती  भगवनी को प्रत्येक पारी में जीत मिली। किन्तु इस बात का निर्णय श्री गणेश से पूछा गया तो उन्होंने में भगवान शिव को ही जीता हुआ बताया। इससे माँ क्रोधित हो गई और उन्हें लंगड़े होने और विविध प्रकार के दुःखों को भोगने का श्राप दिया। जिससे उस बालक ने अपनी अज्ञानता को स्वीकार किया और कहा हे माँ भगवती! मैने किसी पक्षपात के कारण ऐसा नहीं कहा किन्तु यह मेरी निर्णय क्षमता एवं समझ की कमी से मुझसे भूल हुई है। अतः मुझे इस अपराध के लिये क्षमा करें। तथा इससे मुक्त होने की कोई युक्ति भी बतायें। बालक के इस अपराध बोध के कारण तथा माता ने मातृत्व धर्म को निभाते हुये कहा कि आपके श्राप से मुक्ति का एक सरल उपाय है। जिसमें नाग कन्यायें यहाँ कुछ समय गुजरने के बाद नाग देवता की पूजा अर्चना के लिये आयेगी। तो उन्हीं से आप गणपित व्रत एवं पूजा की विधि को पूछ लेना। तथा उसी विधि से गणपित की आराधना करना जिससे तुम इस श्राप से मुक्त होगे। माता इस प्रकार कह कर महादेव भगवान के साथ कैलाश पर विराज गई और समय आने पर उस बालक ने लगातार 12 दिनों तक श्री गणेश की पूजा एवं अर्चना विधान से किया जिससे वह श्राप से मुक्त हो पाया और उसे चलने फिरने की शक्ति प्राप्ति हुई तभी से चतुर्थी तिथि का व्रत प्रसिद्ध हुआ।

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