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रक्षा बंधन

Date :  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

रक्षाबंधन पर्व

यह हमारे धार्मिक पर्वो का उच्च सोपान है। जो असीम मानवता दया, धर्म, दान तथा सहयोग एवं प्यार तथा संबंध एवं समाजिक सरोकारों को उच्च शिखर पर ले जाने का बड़ा सशक्त माध्यम है। यह एक विशाल पर्व के रूप में उत्कृष्ट जीवन जीने तथा मानवता पर बलिहार होने का पर्व है। रक्षा बंधन का पर्व बड़ा ही प्राचीन एवं पारम्परिक है। जो न केवल भाई  भहनों के पवित्र रिश्तों को और पवित्र एवं स्नेहिल बनाता है। बल्कि अपनी धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं तथा रीति रिवाजों को आज भी अटूट रखे हुये है। जिसमें वैदिक, पौरिणक एवं ऐतिहासिक काल से लेकर आज तक कई ऐसे महत्वपूर्ण कथानकों से जुड़ा हुआ है। जो इस रक्षा सूत्र की पवित्रता की ताकत को साफ तौर पर बता रहा है। कि यह कितना पवित्र बंधन हैं। इस सुरक्षा के बंधन से बधने की प्रतिज्ञा कितनी अद्भुत है। जहाँ एक बहन अपने भाई को रक्षा सूत्र से बाँधकर उसकी बड़ी आयु की कामना करती है। तथा यश विजय विभूति से युक्त रखने की कामना सदैव ईश्वर से करती है। कि ईश्वर मेरे भाई पर कभी कोई संकट न आये। वहीं भाई बहिन की हर तरह से सुरक्षा के प्रति कटिबद्ध होता है। तथा बहिन को तरह-तरह के उपहार वस्त्राभूषण आदि देते है। रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्तों में पवित्रता व मधुरता एवं विश्वास का अनूठा संगम है। जो परम्परागत रूप से अति हर्षोल्लास के साथ प्रतिवर्ष श्रावण माह शुक्ल पक्ष तथा पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में बहिन रक्षा सूत्र भाई की दांये हाथ में बाधती हैं। तथा उसकी सतत् उन्नति, दीर्घायु अरोग्यता, पुत्र, पौत्र तथा धन समृद्धि की कामना करती है। यह रक्षा सूत्र रेश्मी धागों एवं सूती धांगों से एवं अन्य आकर्षक तरीके से सजाये जाते हैं। जिसमें गुलाबी, लाल, पीले रंग और नीले आदि रंगों का समावेश होता है।

रक्षा बंधन एवं मान्यतायें

इस पर्व के संबंध में कई वैदिक एवं पौराणिक मान्यतायें है। यह अति प्राचीन है जो वैदिक एवं पौराणिक सभी कालों में प्रचलित रहा है। यह अपने प्रभावशाली पुण्य एवं विजय शुभता एवं सुरक्षा प्रदान करने के कारण आज भी उसी तरह लोगों में प्रचलित है। यह जहाँ स्कूल एवं कालेजो तथा राजनैतिक एवं समाजिक स्तर पर भी मनाया जाता है। वहीं हमारे फौजी भइयों के लिये भी बहनें रक्षा सूत्र भेजती और बांधती हैं। जिससे फौजी भइयों में देश की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता और मजबूत होती है। कहीं-कहीं भाई के साथ भाभी को भी राखी बांधने का प्रचलन है। तथा देवों के झूलों को सजाया जाता है। तथा श्रावण पूर्णिमा के दिन इसे सम्पन्न किया जाता है।

रक्षा बंधन के दिन कैसे राखी बांधे

रक्षा बंधन के एक दिन पहले सुन्दर एक रक्षा सूत्र जिसे आप भी बना सकते हैं। या फिर बाजार में मिल रहे रक्षा सूत्र एवं हल्दी, पुष्प चावल, सिंदूर तथा मिष्ठान आदि लेकर रख लें। तथा रक्षा बंधन के दिन ब्रह्म मुहुर्त में अपने शौचादि एवं स्नानदि क्रियाओं से फुरसत होकर सुमांगलिक नये एवं पवित्र वस्त्रों को धारण करें। और भगवान की पूजा अर्चना करें। इसके पश्चात् जो भी राखी बांधने का मुहुर्त हो उसमें उसका ध्यान रखते हुये सुन्दर मांगलिक थाली को सजाये और उसमें मांगलिक शुभ पदार्थों को रखकर तथा दीप जलाकर उत्तर व पूर्व दिशा की ओर आसन बिछाकर बैठना चाहिए। बहन भाई केे माथे पर हल्दी से टीका करके फिर कुछ चावल के दाने लेकर उसी हल्दी के उपर लगायें । इस दौरान भाई अपने सिर पर कोई स्वच्छ एवं नवीन वस्त्र रखकर प्रसन्न चित्त से राखी बंधवायें। बहन अपने भाई के दायें कलाई पर रक्षा सूत्र को बांधें और कोई मिठाई खिलायें। भाई को चाहिये कि वह बहन के पैर छूकर प्रणाम करें। तथा उन्हें द्रव्य दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करें और उनका आर्शीवाद ग्रहण करें। बहन छोटी या फिर बड़ी हो फिर भी उनसे आर्शीवाद लें। यदि आप किसी पुरोहित या फिर ब्रह्मण से इस दिन रक्षा अपने कल्याण हेतु बंधवाते हैं, तो उन्हें भी प्रणाम करें और यथोचित द्रव्य दक्षिणा दें। क्योंकि प्रत्येक शुभ अवसर पर जहाँ धार्मिक पुरोहित एवं ब्रह्मणों के द्वारा सुरक्षा के लिये रक्षा सूत्र बांधा जाता है। वहीं इस अवसर पर भी इसे बांधने क प्रचलन है।

रक्षा बंधन का शुभ मुहुर्त

इस रक्षा बंधन के लिये विशेष मुहुर्त निश्चित रहता है। उसी समय शुभ मुहुर्त में रक्षा बाधा जाता है। भद्रा काल एवं अशुभ समय एवं मुहुर्त में रक्षा नहीं बाधा जाता है। इससे वांछित फलों की प्राप्ति नहीं होती है। तथा रक्षा एवं सुरक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है। अतः रक्षा बंधन के समय शुभ मुहुर्त का ध्यान दें। भद्रा काल में रक्षा सूत्र नहीं बांधना चाहिए। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है, रक्षा बंधन के पर्व को मध्यान्ह एवं अपराह्ण व्यापिनी श्रावण पूर्णिमा को मनाने का नियम होता है। भद्रा काल में रक्षा बंधन वर्जित माना जाता है। भद्राकाल राजा तथा प्रजा दोनों के लिए हानिप्रद हो सकता है। अर्थात् शुभ घड़ी, शुभ मुहूर्त में प्रसन्न मन से इसे मनाने का विधान होता है।

रक्षा बंधन का महत्व

पवत्रि रक्षा बंधन का त्यौहार जहाँ संस्कृति एवं धार्मिक दृष्टि से अति विशष्टि एवं महत्वपूर्ण हैं, वहीं यह सेहत एवं सुरक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। इसे रक्षा सूत्र कहा जाता है। जिसके पुण्य प्रभाव से रोग, भय, शोक का नाश होता है और रक्षा सूत्र के हाथ में रहने से कई बाधाओं से सुरक्षा होती रहती है। ऐसे लोग जिनके बहने नहीं हैं। वह किसी धार्मिक पुरोहित एवं पण्डित के द्वारा रक्षा सूत्र बंधवा लें। इस अवसर पर रक्षा सूत्र का विशेष महत्व हो जाता है। किन्तु मंत्र द्वारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र हो तो उसका और भी महत्व बढ़ जाता है। अतः रक्षा सूत्र बांधन का जो मंत्र है। उसे पुरोहितों एवं धार्मिक पण्डितों के द्वारा प्रयोग किया जाता है। रक्षा सूत्र के बांधने के समय इस मंत्र को उच्चारण करना अच्छा रहता है। मंत्र जैसे-येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल।। अर्थात् गुरू चेला के और चेला गुरू के धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षा बध्ंान करते हैं, जिससे परस्पर सुरक्षा एवं सम्मान की भावना पूर्ण होती है। सम्पूर्ण भारत ही नहीं बल्कि विश्व में जहाॅ भी हिन्दू धर्म को मानने वाले है या फिर इस रक्षा पर्व को मनाने वाले हैं। वह सभी इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस प्रकार रक्षा बंधन के त्यौहार का जहाँ धार्मिक महत्व हैं वहीं पौराणिक एवं सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन में भी इसका महत्व है। इस पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति आदि पदों पर आसीन लोग जैसे प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द मोदी जी आदि। इस अवसर पर बहन बेटियों से रक्षा सूत्र बंधवाते हैं। जिससे यह और  भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अर्थात् यह बहन के हर मुशीबत में भाई के द्वारा साथ देने तथा शत्रुओं एवं रक्षसों से घिरे हुये लोगों के लिये यह रक्षा विधान बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार प्रकृति के संरक्षण के लिये तुलसी एवं पीपल आदि के वृक्षों में रक्षा बाधंने का विधान होता है। इस पर्व पर तरह-तरह के पकवान आदि तैयार किये जाते हैं। राजधानी दिल्ली में रक्षा बंधन के पर्व पर सरकारी बसों में सभी माताओं एवं बहनों के लिये मुक्त यात्रा की व्यवस्था की जाती है। इसे हिन्दू एवं जैन धर्म के लोग बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। इस पर्व को वैदिक एवं पुरोहित ब्रह्मण वैदिक उपाकर्म के रूप में मानते हैं और तीर्थ या जलाशयों में जाकर उपाकर्म को सम्पन्न करते है। जिसे श्रावणी पूर्णिमा कहा जाता है। श्रावणी पूर्णिमा पर अनेक स्थानों में मेलों का आयोजन किया जाता है।

रक्षा बंधन की कथायें

रक्षा बंधन के संबंध कई कथायें प्राप्त होती है। जिससे में भविष्यपुराण की पौराणिक कथा के अनुसार बलि नाम के राक्षस ने भगवान इन्द्र को पराजित कर दिया। और उनकी अमरावती नाम की नगरी में अपना कब्जा जमा लिया था। इन राक्षसों के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने विजय लक्ष्य हासिल करने के लिये देव गुरू बृहस्पति से उपाय पूछा तब बृहस्पति ने विजय हासिल करने के लिये देवताओं को विधि पूर्वक रक्षा सूत्र का विधान सम्पन्न कराया था। तथा शची ने श्रावण पूर्णिमा के दिन ब्रह्मणों से रक्षा सूत्र लिया जिसके पुण्य प्रभाव से इन्द्रादि देव समूहों को विजय प्राप्त हुई। इसी प्रकार एक दूसरे कथानक के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण जब अपने सुदर्शन चक्र के वार से शिशुपाल को मार रहे थे तभी उनके हाथ में अचानक चोट आ गयी और रक्त बहने लगा इसे देखकर द्रौपदी ने भगवान के हाथ में साड़ी के किनारें को फाड़कर हाथ में अपना भाई मानते हुये बांधा था। जिससे भगवान बहुत प्रसन्न हुये और श्रीकृष्ण ने अपने भाई धर्म की प्रतिज्ञा को पूरा करते हुये द्रौपदी की लाज बचाई और जब भी उनकी बहन पर संकट पड़ा तो वह भाई बनकर उनकी रक्षा करते रहे। श्रीकृष्ण ने इस पर्व के बारे में खुद युधिष्ठिर को समझाया था। जिससे सभी पाण्डवों की सेना ने रक्षा सूत्र का विधान करवाया और करवों से विजय श्री प्राप्त कर ली। यह तो रक्षा सूत्र का ही पुण्य प्रताप था। इस पर्व के अवसर पर राजनैतिक कथान भी है कि श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस पर्व के मौके पर बंगाल के निवासियों से सहयोग की अपील की थी जो बड़ी ही कारगर रही है। इस रक्षा बंधन के पर्व से मेवाड़ की रानी कर्मावती की कहानी जुड़ी हुई है। जिसमें बहादुर शाह ने उनके राज्य में आक्रमण करने की योजना बना रखी थी जिसकी जानकारी रानी को हुई तो उन्होनें इस युद्ध में मद्द के लिये मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा की बात कही थी। जिसे मुसलमान होते हुये भी हुमायूँ ने स्वीकार किया और उनकी रक्षा की। इसी प्रकार सिकन्दर की पत्नी ने पुरूवास को राखी बाँधकर अपना भाई स्वीकार और अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। इस प्रकार रक्षा बंधन एवं राखी के अवसर पर कई फिल्म एवं संगीत का निर्माण हुआ।

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